
●समीक्षक- डॉ. संध्या सिलावट
पुस्तक- कलम का दिहाड़ी मजदूर
लेखक- विवेक सत्यांशु
प्रकाशक- हिन्दुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज
कलम का दिहाड़ी मजदूर कविता संग्रह विवेक सत्यांशु द्वारा रचित है। जो हिंदुस्तानी एकेडेमी उ. प्र. , प्रयागराज द्वारा प्रकाशित किया गया है। सत्यांशु का शाब्दिक अर्थ है सूरज की किरण, जिसका प्रतीकात्मक अर्थ सकारात्मकता अथवा आंतरिक शक्ति की ऊर्जा । यथार्थ का सामना करते- करते पीड़ा, चिंताएं, विषाद, विसंगतियां कवि की कलम से-कविता के रूप में फूटती हैं । आत्म कथन में ही मूल्यों के गिरावट की बात करते हैं।
ज्यां पाल सार्त्र व प्रेमचंद का उदाहरण देकर स्पष्ट करते हैं कि लेखकीय अस्मिता और स्वाभिमान पुरुस्कारों से बड़ा होना चाहिए – तुलसी दास जी की पंक्तियॉं उद्धृत करते हैं-
‘हम चाकर रघुवीर के , पट लिख्यौ दरबार,
तुलसी अब का होइगै, नर के मनसबदार’
फ्रेंच इतिहासकार रोलैंन बार्थ का उदाहरण देते हैं कि पाठ महत्वपूर्ण है, लेखक नहीं – रचनाएं महत्वपूर्ण है, रचनाकार नहीं।
स्वयं की जीविका का आधार कलम को बताते हैं, कलम यानि जिससे वह रचनाकर्म करते हैं और इस रचनाकर्म से होने वाले अर्थ से अपना जीवन निर्वाह करते हैं, स्वयं को गर्व से कलम का दिहाड़ी मजदूर कहते हैं।
इनकी कविताओं में करुणा, व्यंग्य और विवशता की स्पष्ट बयानी है। सीधे-सीधे अपनी बात कठोर शब्दों (अच्छे न लगने वाले शब्दों में) में भी बिना लाग लपेट के कहने का प्रयास करते हैं जैसे-
जवान लाशें दिखाई पड़ेंगी सड़कों पर,
भूखी अँतड़ियॉं चौराहे पर
तमाशा बन जायेंगी
जो पाठक के मन में भविष्य की चिंता जगाती हैं, और भावी पीढ़ियों के बारे में सोचने के लिए विवश कर जाती हैं।
संग्रह में कुल 65 कविताएं हैं। जिसमें ‘कलम का दिहाड़ी मजदूर’ कविता में वह समाज में गिरते मूल्यों की बात करते हुए अपना दुःख प्रकट करते हैं कि वह सदा सद्गुण की राह पर चले, जो लोग नैतिक रूप से गिरते हुए, दूसरों का आजीवन लूटते रहें, समाज ने भी उन्हें सहराया, और दुःख-कष्ट सहकर भी सद्ममार्ग पर चलने वालों की आलोचना होती है।
औरत-1,2,3 में औरतों की कठिन जीवन यात्रा को भी दिखाते हैं, जेठ की तपती दोपहरी में भी औरतें अपने परिवार के लिए जी-तोड़ श्रम कर धनार्जन करने का प्रयास करती हैं। आजीवन अपनी गृहस्थी जोड़ने और अपने कर्तव्यों को निभाने में जुटी रहती हैं, पीड़ा झेलती रहती हैं।
नेल्सन मंडेला कविता में वह कहते हैं कि कई बार अच्छे मनुष्यों की मृत्यु में दो लोग भी शामिल नहीं होते, परंतु शवयात्रा में शामिल होने वाली भीड़ इस बात का प्रतीक नहीं हो सकती कि मरने वाला बड़ा सद्गुणी था।
पिता शीर्षक से इनकी तीन कविताएं हैं जिनमें वह पिता की महानता का वर्णन करते हैं कि पिता स्वयं कष्ट में रहकर भी अपने बच्चों को सुखी बनाने का यथा संभव प्रयास करते हैं। पिता के शव को अग्नि देना कवि के मन को झकझोरता है, उसे लगता है कि अपने हाथों से अपने पिता को अग्नि देना क्रूर प्रथा है, जो पुत्र को अंदर तक हिलाती है। मृत्यु के पश्चात् भी पिता का अस्तित्व बच्चों की यादों और घर की वस्तुओं में रहना है, जिन्हें नष्ट कर दिया जाता है। पैर और जूते नाम से भी इनकी कविताएं है, जूतों के माध्यम से यह बहुसंख्यक गरीबों के अभावों का वर्णन करते हैं। बूढ़ा-चित्रकार कविता में ऐसे चित्रकार का वर्णन है जो एक नायिका का हृदय से प्रशंसक था, नायिका का सौंदर्य चित्रण चित्रकार को बहुत यश दिलाता है, नायिका उसके लिए महत्वपूर्ण है, पर नायिका को उसकी कोई परवाह नहीं है। एक तरफा लगाव चित्रकार को अकेला रखता है। बिसाती कविता में वर्णन है कि गॉंव की औरतों का मधुर और अपनेपन का व्यवहार चूड़ियों का व्यवसाय करने वाला बिसाती में अपनत्व जगाता है, शहर में लूटे जाने पर यही व्यवहार उसे याद आता है। कविता राम में और कविता सीता में यह उनके आदर्शों का वर्णन करते हैं कि राम ने कैसे आम जनों की मदद से रावण से युद्ध जीता। किसी राजा से नहीं मदद मॉंगी।
इशारे कविता में वह शब्दों से ज्यादा बात को संकेतों में कहने का महत्व बताते हैं। यादें कविता में वह स्मृतियों का महत्व प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्यों का कष्ट भरा समय यादों के सहारे सरलता से कट जाता है।
प्रकृति की करुणा का वर्णन करुणा कविता में करते हैं। कोरोना, एवं जगह कविताओं में वह कोरोनाकाल के भयावह वातावरण और लोगों के मन में व्याप्त भय का चित्रण करते हैं। कोरोनाकाल में मरने वालों को श्मशान और कब्रिस्तान में भी मृतकों की संख्या अधिक होने के कारण जगह नसीब नहीं हो रही थी। रिश्ते कविता में बताते हैं कि कोरोना ने रिश्ते भी संक्रमित कर दिए हैं, स्वयं का बेटा भी अंतिम संस्कार में शामिल होने से मना कर रहा है। वसुधैव कुटंबकम वाले इस देश में वैज्ञानिक उन्नति होने के बाद भी लोग ऑक्सीजन के बिना मर रहे हैं, ऐसा विकास किस काम का।
आत्महत्या कविता में उन लोगों की दृढ़ इच्छा शक्ति की प्रशंसा करते हैं जो जीवन में सफल भी नहीं है, जीवन के दुःखों को झेल रहै हैं, परंतु फिर भी आत्महत्या नहीं करते, ईश्वर के दिए जीवन को यथासंभव जीने का प्रयास करते हैं। जबकि जीवन में कई बार सफल व्यक्ति भी आत्महत्या कर लेते हैं।
घर से भागी हुई लड़कियॉं कविता में ये कहते हैं कि ये लड़कियॉं जीवन में मजबूती से आगे बढ़ना चाहती हैं, इन्हें घर की दीवारों में कैद नहीं रहना है। अविवाहित लड़कियॉं कविता में जैसे-तैसे जीवन काटती तानें सहती लड़कियों का दर्द दिखाते हैं।
संघर्ष के सबसे प्यारे कविता में वह कहते हैं कि उन्हें अपने संघर्ष के दिन प्रिय हैं, उन सभी व्यक्तियों के बारे में लिखना चाहते हैं जो केवल संघर्ष करते रहे, सफल नहीं होने से उन्हें कहीं कोई नाम नहीं मिला, वे अपने सिद्धातों पर अडिग चलते रहे, मानवता के लिए शहीद हो गए।
धूल-धूसरित कविता में वह उन एक तरफा सच्चा प्यार करने वाले घनानंद आदि का वर्णन करते हैं जो आजीवन अपनी प्रेमिकाओं के वियोग में तड़प-तड़प कर कष्ट भोगते रहे, उनके गहन प्रेम ने इन प्रेमिकाओं को जग में अमर बना दिया, स्वयं प्रेम में आजीवन पीड़ा भोगते रहे।
लड़की का पिता कविता में एक पिता जेठ की गर्मी में अपनी पुत्री को परीक्षा दिलाने जाता है, परीक्षा पुत्री के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण है, पिता की इच्छा है कि वह पुत्री को कक्ष के अंदर तक छोड़ दे, परंतु चौकीदार उसे बुरी तरह डॉंट कर अपमानित कर देता है, लड़की पिता के अपमान का कारण स्वयं को मानते हुए अत्यंत दुःखी हो जाती है, उसकी रुलाई फूट पड़ती है। वह अपने पिता के कष्ट को बखूबी समझती है।
भद्रजन कविता में कवि हाशिये पर पड़े लोगों के दुःख पर कविता लिखना चाहते हैं, उन्हें उनके दुःख से पूरा सरोकार है। यह उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
हमारा गॉंव कविता में वह अपने पुराने गॉंव को याद करते हैं, जहॉं प्रकृति के साथ एकाकार होकर ग्रामीण जीवन व्यतीत करते थे।
जीवन और मृत्यु कविता में जीवन की क्षणभंगुरता की बात करते हैं, भौतिक साधनों की अंधी दौड़ में भाग लेने के बजाए सादा प्रेमपूर्वक जीवन जीने का संदेश देते हैं।
सुबह टहलने जाते वक्त कविता में वह कचरा बीनने वालों की विवशता का वर्णन करते हैं कि गंदगी में से अपने काम की वस्तु तलाशने में भिड़े इन लोगों का स्वास्थ्य भी दॉंव पर लगा रहता है, संभवतया जरुरत की आपूर्ति स्वास्थ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
ऑंख की पुतली कविता में एक साहित्यकार स्त्री का वर्णन करते हैं जो अच्छी बात छोड़कर अंत में जेल पहुँच गई।
बिस्तर कविता में वह लिखते हैं कि बिस्तर केवल आराम की वस्तु नहीं है, विभिन्न परिस्थितयों में यह विभिन्न भूमिका निभाता है।
कुत्ते कविता में कुत्ते आदमी को शंका से देखते हैं, आदमी दूसरे आदमी को शंका से देखता है। मौत कविता में उस मॉ का दुःख है जिसका बेटा सड़क- दुर्घटना में अकाल मौत मर चुका है।
प्रेम कविता में प्रेम का महत्व है कि व्यक्ति को अगर थोड़ा सा भी प्रेम मिलता रहता है तो यह प्रेम उसे गलत रास्ते पर जाने से रोके रहता है।
बेरोजगार, बच्चे, उन्मुक्त, अँधेरे में, मंगल ग्रह, घर, भूलना, नरक, कविता, सड़क, मॉं, उम्र के पच्चीसवें दहलीज पर, तुम्हारी आवाज, नौकरी, दरवाजे, खोज, किताबें, प्रकृति, लालटेन, मैं लिखूंगा, पानी, साहित्य, इक्कसवीं सदी, धागा, कलम आदि सभी कविताओं में कवि ने एक छोटा सा भाव उठाया और अपने अंतर्मन को बाहरी दुनिया से जोड़कर सभी के मन में उपजने वाली बात कह डाली। कहीं ये बातें अत्यंत साधारण हैं, कहीं ये व्यक्ति को अपने अस्तित्व का भान कराती प्रतीत होती हैं। हर भाव आम आदमी के मन में उपजने वाला भाव है, एक साधारण व्यक्ति के मनोभावों को दुनिया में अपना अस्तित्व कायम रखने हेतु जो करना होता है, या जो वह झेलता है, कलम के मजदूर ने उन्हीं को सफलता से अभिव्यक्त किया है। भाषा सहज, सरल है।
#डॉ. संध्या सिलावट,
उपायुक्त, राज्य कर,
इंदौर

