माता की सेवा से ही नसीब बनता

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sanjay

दोस्तों आज मुझे बहुत ही गहराएहसास हुआ एक इंसान कीमातृभक्ति  का कैसे वो अपनीबूढ़ी माँ की सेवा करता है /साथियो कुछ करो कितने भीदयालू बनो , दान धर्म करो , परन्तु यदि वो इंसान अपनेमाता पिता की सेवा या उनकाआदर नहीं करता तो वो कभीभी सुखी नहीं रह सकता / कहते की इंसान कितने ही जन्मक्यों न ले परन्तु माता का कर्जवो कभी भी नहीं उतार सकताहै /यदि माँ घर में सुखी है तो वोघर अपने आप ही मंदिर बनजाता है/ क्योकि माँ सदा हीअपने परिवार और बच्चो केलिए कितनी प्रार्थना और व्रतऔर धार्मिक अनुष्ठान निरंतरकरती रहती है / किसके केलिए ? स्वंय के लिए क्या , नहींवो सब अपने बच्चो औरपरिवार के लिए ही कठिन सेकठिन साधना करती है / जिनघरो में माता पिता का सम्मानया उनकी उपेक्षा की जाती हैआप उन परिवारों का माहौलदेखना ? माना की उनके पासपैसे बहुत होंगे परन्तु में दावे सेकहा सकता हूँ की उनके घरो मेंशांति नहीं होगी / घर कामाहौल कुछ अलग ही होगा।संस्कार बच्चो में नहीं होंगे / सिर्फ पैसा होगा / परन्तुमानसिकता ठीक नहीं होगी / दोस्तों अपनी बात को समझनेके लिए एक छोटी सी कहानीका सहारा लेता हूँ / में कलबाज़ार में फल खरीदने गया, तोदेखा कि एक फल के ठेले पर   एक छोटा सा बोर्ड लटक रहाथा, उस पर मोटे अक्षरों सेलिखा हुआ था…

“घर मे कोई नहीं है, मेरी बूढ़ी माँबीमार है, मुझे थोड़ी थोड़ी देर मेंउन्हें खाना, दवा और टॉयलटकराने के लिए घर जाना पड़ताहै, अगर आपको जल्दी है तोअपनी मर्ज़ी से फल तौल लें, रेटसाथ में लिखे हैं।

पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रखदें, धन्यवाद!!” मुझे देखकरपहले तो बहुत ही हैरानी हुई कीइस तरह से दुकान खोलकरबोर्ड लगा दिया वो भी आज केज़माने में जहाँ हर इंसान एकदूसरे को लौटने के लिए तैयाररहता है /

साथ ही एक लाइन और भीलिखी थी और उन लाइन ने मेरादिल जीत लिया “अगर आपकेपास पैसे नहीं हो तो मेरी तरफसे ले लेना, इजाज़त है.”.!! इसीलाइन के कारण मुझे लगा कीकी भी उसकी दुकान से चोरीनहीं कर रहा है / क्योकि वोखुद ही बोल रहा है की ले लोबिना पैसे के / दोस्तों कितनाभी बड़ा लूटेरा हो , यदि कोईइंसान उससे कहाँ की ले जाओमाल जो आपको ले जाना है , तो निश्चित ही वो लूटेरा एकपैसा लौटकर नहीं ले जायेगा /

मुझे भी फल लेना था तो मैंनेइधर उधर देखा, पास पड़े तराजूमें दो किलो सेब तोले दर्जन भरकेले लिये, बैग में डाले, प्राइसलिस्ट से कीमत देखी, पैसेनिकाल कर गत्ते को उठाया, वहाँ सौ-पचास और दस-दस केनोट पड़े थे, मैंने भी पैसे उसमेंरख कर उसे ढंक दिया।

मन ही मन सोचा और बैगउठाया और अपने फ्लैट पे आगया, परन्तु जो मैंने आज देखावो दृश्य मेरे दिलो दिमाग से नहींनिकल रहा था / रात को खानाखाने के बाद मैं उधर से निकला, तो देखा एक कमज़ोर साआदमी, दाढ़ी आधी कालीआधी सफेद, मैले से कुर्ते पजामेमें ठेले को धक्का लगा कर बसजाने ही वाला था, की वो मुझेदेखकर मुस्कुराया और बोला”साहब  आज तो फल तो खत्महो गए।” मैंने बोलै कोई बातनहीं / मैंने पूछा की आपकाक्या नाम है तो बोला जीसीताराम, और कुछ चलतेचलते बात करते रहे /

फिर हम सामने वाले ढाबे परबैठ गए। मैंने चाय मँगाई, वोकहने लगा, “पिछले तीन सालसे मेरी माता बिस्तर पर हैं, कुछपागल सी भी हो गईं है औरअब तो फ़ालिज भी हो गया है, मेरी कोई संतान नहीं है, बीवीमर गयी है, सिर्फ मैं हूँ और मेरीमाँ..!

माँ की देखभाल करने वालाकोई नहीं है, इसलिए मुझे ही हरवक़्त माँ का ख्याल रखनापड़ता है / और उसके पास बारबार जाना पड़ता है /

बाबूजी एक दिन मैंने माँ के पाँवदबाते हुए बड़ी नरमी से कहा, “..माँ!! तेरी सेवा करने को तोबड़ा जी चाहता है पर जेबखाली है और तू मुझे कमरे सेबाहर निकलने नहीं देती, कहतीहै, तू जाता है तो जी घबरानेलगता है, तू ही बता मै क्याकरूँ?” न ही मेरे पास कोई जमापूंजी है।.. ये सुन कर माँ नेहाँफते-काँपते उठने की कोशिशकी। मैंने तकिये की टेकलगवाई, उन्होंने झुर्रियों वालाचेहरा उठाया अपने कमज़ोरहाथों को ऊपर उठाया, मन हीमन राम जी की स्तुति की फिरबोली.. “तू ठेला वहीं छोड़ आयाकर, हमारी किस्मत का हमें जोकुछ भी है, इसी कमरे में बैठकरमिलेगा।” मैंने कहा, “माँ क्याबात करती हो, वहाँ छोड़आऊँगा तो कोई चोर उचक्कासब कुछ ले जायेगा, आजकलकौन लिहाज़ करता है? औरबिना मालिक के कौन फलखरीदने आएगा?”

कहने लगीं.. “तू राम का नामलेने के बाद बाद ठेला को फलोंसे भरकर छोड़ कर आजा बस, ज्यादा बक-बक नहीं कर, शामको खाली ठेला ले आया कर, अगर तेरा रुपया गया तो मुझेबोलना समझा

बाबूजी ढाई साल हो गए हैं ,सुबह ठेला लगा आता हूँ …शामको ले जाता हूँ, लोग पैसे रखजाते हैं.. और फल ले जाते हैं, एक धेला भी ऊपर नीचे नहींहोता, बल्कि कुछ तो ज्यादा भीरख जाते हैं, कभी कोई माँ केलिए फूल रख जाता है, कभीकोई और चीज़!! ” परसों एकबच्ची पुलाव बना कर रख गयी,साथ में एक पर्ची भी थी “अम्माके लिए!”

एक डॉक्टर अपना कार्ड छोड़गए पीछे लिखा था, ‘माँ कीतबियत नाज़ुक हो तो मुझे कॉलकर लेना, मैं आ जाऊँगा, कोईख़जूर रख जाता है, रोजानाकुछ न कुछ मेरे हक के साथमौजूद होता है। न माँ हिलनेदेती है न मेरे राम कुछ कमीरहने देते हैं, माँ कहती है, तेरेफल मेरा राम अपने फरिश्तों सेबिकवा देता है। दोस्तों माँ बापक्या कुछ नहीं करते अपनेबच्चो के लिए और आज केज़माने में बहुत कम लोग अपनेमाँ बाप को वो स्थान देते है / जिनके बो असली हक़दार है / माँ की वाणी में वो सत्य औरआशीर्वाद छुपा होता है जिसकबच को कोई भी नहीं छेदसकता है / फल वाले कोअपनी मां के प्रति पूरा सम्मानऔर सेवा भाव था तो किसतरह उसकी दुकान को स्वंयपरमात्मा ने चलाकर उसेस्वाभिलाम्बी बनाकर जो मृतसेवा करवाई है वो अपने आपमें एक मिसाल है / यदि आपकेभाव सेवा के है तो परमात्मा भीआपकी मदद करता है

आखिर में, इतना ही कहूँगा कीअपने मां -बाप की सेवा करो,और देखो दुनिया कीकामयाबियाँ कैसे हमारे कदमचूमती हैं।

          #संजय जैन

परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों  पर भी दिखा चुके हैं। इसी प्रतिभा से  कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें  सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखते हैं। मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की  शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है,जबकि लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।

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Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।