
दो मेधावी छात्र विनय और तेजस पक्के मित्र गुरुकुल में रहते थे। नाम अनुरूप विनय बहुत ही अच्छा और तेजस गुस्सैल बालक था। विनय चाहता था तेजस भी उसी के जैसा विनयशील बन जाए,इसके लिए विनय ने अपने गुरु रामदास जी का सहारा लिया। गुरु ने दोनों को अपने पास बुलाया और तेजस को बहुत सारी लोहे की कील और विनय को कील के बराबर नन्हें पौधे दिए। दोनों से कहा कि,तेजस तुम्हें जब भी गुस्सा आए,तुम ये कील इस लकड़ी पर ठोंक देना और विनय जितनी बार तेजस कील ठोकेगा,उतने पौधों का तुम रोपण करना। और आज ही की तारीख में तुम दोनों अपने-अपने अनुभव बताना। गुरु आज्ञा पाकर दोनों शिष्य कील ठोंकने और वृक्षारोपण का कार्य करने लगे। पहले पहल दिन तेजस ने ३७ कील ठोंकी। फिर ३३,२९,२७,२४,१८,१३ कील ठोंकी। कील ठोंक-ठोंककर तेजस थक जाता और फिर एक दिन उसने सोचा,मैं अपनी ऊर्जा को बेकार ही कील ठोंकने में बर्बाद कर रहा हूँ। ऐसा सोचते- सोचते वो गुस्सा करना भूल गया। इधर विनय ने पौधे लगा-लगाकर पूरा बगीचा तैयार कर लिया और उन्हें पानी-खाद से सींचकर हरे-भरे बाग में परिवर्तित कर दिया। एक माह बाद दोनों मित्र गुरु जी के पास गए। गुरु जी ने कहा-हम उस जगह चलते हैं,जहाँ तुम दोनों ने अपने कार्य को अंजाम दिया है। राह में दोनों अपना अनुभव सुनाना। पहले तेजस ने बताना शुरू किया-शुरू में तो मुझे अच्छा लगा कि मैंने इतनी सारी कील ठोंकी, फिर धीरे-धीरे मुझे इसमें बोरियत होने लगी और जब विनय के बगीचे को देखा तो मुझे अपनी ऊर्जा बर्बाद लगने लगी। मैंने अपना समय व्यर्थ गंवाया और फिर मैंने गुस्सा करना छोड़ दिया, तो जीवन आनन्दमय लगने लगा। बातों ही बातों में वे बगीचे तक पहुँच गए। अब बारी विनय की थी,विनय ने कहा-पहले तो मुझे आलस आता कि तेजस की वजह से मुझे कितने गड्ढे खोदने पड़ते हैं। फिर पौधे लगाना,फिर पानी-खाद,लेकिन धीरे- धीरे मुझे इस काम में मज़ा आने लगा। जब ये उपवन बनकर तैयार हुआ,इसमें फूल खिलने लगे तो मेरे आनन्द का कोई पारावार ही न रहा। गुरुजी,मुझे प्रतिफल में ये मुस्कुराते फूल मिले। तेजस कुछ उदास-सा था। वो कुछ कहता,इससे पहले ही गुरु जी ने जीवन का एक और पाठ सिखाना शुरू किया। उन्होंने तेजस से कहा-अब इस लकड़ी से तुम्हें सारी कील वापस निकालनी है,विनय भी इस कार्य में तुम्हारी मदद करेगा। दोनों मित्रों ने तेज़ी से सारी कील निकालकर गुरु जी के चरणों में रख दी। गुरु जी ने कील निकली लकड़ी को अपने हाथों में लिया और कहा-‘बच्चों तुमने क्रोध में आकर लकड़ी पर वार किया,यानी कील ठोंकी। फिर क्रोध शांत होने पर क्षमा स्वरूप तुमने ये कील निकाल ली। तुम दोनों इस लकड़ी को ध्यान से देखो,कील निकल गई लेकिन निशान रह गया। ठीक इसी तरह क्रोध में कहे हुए अपशब्द माफी माँगने के बाद भी इसी तरह दिल में चुभकर,दिल को जख्मी कर देते हैं, इसलिए जब कभी क्रोध आए,उसका पलायन करें। उस क्रोध की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलकर जीवन के बाग को पल्लवित करें’।
उसी दिन से दोनों मित्रों ने अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रण कर गुरु जी का आशीर्वाद लिया। इस प्रकार विनय की सच्ची मित्रता ने गुरु के साथ से तेजस के जीवन को प्रकाशित कर दिया।
#प्रणिता सेठिया ‘परी’
परिचय : प्रणिता राकेश सेठिया का लेखन में उपनाम ‘परी’ है। आप रायपुर(छत्तीसगढ़)में रहती हैं। लेख,कविता,गीत,नाटिका,लघुकथा, कहानी,हाइकु,तुकांत-अतुकांत आदि रचती हैं। आपकी साहित्यिक उपलब्धि यही है कि,कई सामाजिक पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित होती हैं। शतकवीर सम्मान,महफ़िल-ए-ग़ज़ल और काव्य भूषण सम्मान से अलंकृत हो चुकी हैं। हाइकु रचनाकारों की किताब में आपकी रचना भी जल्दी ही प्रकाशित होगी। अन्य उपलब्धि में उच्च १० उद्यमी महिलाओं में आप चौथे क्रम पर रहीं हैं। प्रणिता राकेश सेठिया ‘परी’ ने उत्कृष्ट समाजसेवा के लिए कई बार सम्मान पाया है।