हंसी-ठिठोली आंख-मिचौनी,
बचपन के दिन वो चार।
स्मृति पटल पर आता जब भी बचपन,
हो जाता नव ओज का संचार।
खेल-खिलौने गुड्डे-गुड़िया,
मिलता निश्छल सबका दुलार।
आना-कानी अथक मनमानी,
मां की डपट में छिपा रहता प्यार।
साथी-संगी का सांझा झोल झपाटा,
गुंंथा रहता स्नेह का अटूट धागा।
निश्छल तरंग नित नवीन रंग,
बचपन के पल मधुर।
#हेमलता गोलछा ‘प्रियंका’
परिचय : हेमलता गोलछा का साहित्यिक उपनाम-प्रियंका है। १९८२ में २४ सितम्बर को जन्मीं और जन्म स्थान-श्रीडूंगरगढ़(राजस्थान)है। वर्तमान में गुवाहाटी के तरुण नगर में रहती हैं।
शहर-गुवाहाटी(आसाम)निवासी प्रियंका की शिक्षा-स्नातक(कला)एवं कार्यक्षेत्र-गृहिणी का है। आप सामाजिक क्षेत्र में
विभिन्न साहित्यक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन में कविता,मुक्तक और कहानियां आप लिखती हैं। प्रकाशन में आपके नाम-हिंदी सुलभ व्याकरण पाठ्य पुस्तक(भाग १,२,३,४,५) है। विभिन्न संस्थानों से सम्मानित हैं,जिसमें तेजस्वी सम्मान भी शामिल है। आपकी दृष्टि में लेखन का उद्देश्य-समाज में फैली विकृति को दूर करने की छोटी-सी कोशिश करते रहना है।
Wed Jan 17 , 2018
उछालता है हर रोज कीचड़ मुझ पर, पर वो ये नहीं जानता कि कीचड़ में ही अक्सर उगा करते हैं कमल। शब्दों के बाण चलाता है मुझ पर, पर वो ये नहीं जानता कि गुस्से पर डाल दिया है मैंने शीतल जल। भरम में है वो कि राह अकेली हूं […]