अपने ही दम पे
उड़ती हुई
पतंग हूँ,
पता नहीं डोर का
कच्ची है,कि पक्की,
हवाओं के सहारे
निकली हुई
पतंग हूँ।
मिल जाए खुला गगन तो
पवन की क्या बिसात,
अंदर से चोट खाई हुई
पतंग हूँ।
कौन उड़ाए,
कौन काटे
कौन लूटेगा मुझे,
क्या पता ?
लुटेरों की बस्ती में,
कटी हुई
पतंग हूँ।
कागज़ की काया लेकर
निकाली हूँ तूफानों में,
ज़िन्दगी के हर मुकाम
फतेह करने वाली,
पतंग हूं मैं…॥
#कृनाल प्रियंकर
परिचय : कृनाल प्रियंकर गुजरात राज्य के अहमदाबाद से हैं और स्नातक(बीकॉम)की पढ़ाई पूरी कर ली हैl आप वर्तमान में ग्रामीण विकास विभाग(गुजरात) में कार्यरत हैंl इन्हें शुरु से ही कविताओं से विशेष लगाव रहा है,तथा कविताएं पढ़ना-लिखना बेहद पसंद हैl
Tue Jan 16 , 2018
सवालों के जंगल में खो गई है ज़िन्दगी। उम्मीद के सैलाब में बह गई है ज़िन्दगी॥ बेबस है हर कोई,मंज़िल न मालूम। मुसाफिर बन के,रह गई है ज़िन्दगी॥ हर सुबह लेती है,जन्म एक नई ख्वाहिश। न जाने कैसे-कैसे खवाब,सजाती है ज़िन्दगी॥ कभी खुशनुमा कभी,गमगीन आई मंज़िलें। सुकून के इंतज़ार में,कट […]