मुझे तजुर्बा नहीं इतना कि,
जिंदगी का हिसाब करुं
बस जो पल मिल जाते हैं,
उन्हें अपना किये जाती हूँ।
तुम ढूंढ लो उन किनारों को,
जो साहिल से जुड़े न हों
तजुर्बेकार बनते हो,
गुल से अलग करके देखो
सुगन्ध कहाँ ठहरी,
सलीकेदार बनते हो।
एक अदब-सा है निगाहों में मेरी,
इश्क ने मुझे हुनरमन्द बना दिया॥
#विजयलक्ष्मी जांगिड़
परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़ जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।
Sat Jan 6 , 2018
जग वालों को बात यही बस खलती रहती है बीच भँवर में नाव हमारी चलती रहती है। काबू में रख लेना चाहे हर कोई इसको, लेकिन ये तो उम्र निगोड़ी ढलती रहती है। तेरी यादों की बस्ती से हर दिन गुजरा हूँ, दिल की धड़कन यादों के बल चलती रहती […]