सृजन सृष्टि
का चलता
प्रतिपल,
सरिधार बहे
ज्यों निर्झर
कल-कल।
प्रश्न जुड़े
जब ‘कारण’
से,
एक नूतन
सिरजन अस्तित्व
लिए,
नव शोध,निष्कर्ष,
निर्धारण से।
एक सोच
लहर-सी आती है,
मन चेतन सजग
बनाती है,
सब इंद्रियां संचालित
हो जाती हैं,
एक चक्र सृजन
का चलता है,
कुछ नवल नया
गढ़ जाती हैं।
माटी का मोल
नही होता,
पर जीवन का
अंत वहीं सोता,
वही माटी सोना
बनती है,
जब चाक कुम्हार
के चढ़ती है,
कितने रूपों में
ढलती है,
और कितने सृजन
गढ़ती है।
यह जीवन समझो
माटी सम,
मत भूलो अपना
अंत गमन,
तो क्यों ना हम
कुम्हार बनें ?
नित सुन्दर कृतियां
चाक ढले,
जो आत्मसंतुष्टि
देता हो,
सृजन महत्ता
कहता हो॥
#लिली मित्रा
परिचय : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर करने वाली श्रीमती लिली मित्रा हिन्दी भाषा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण रखती हैं। इसी वजह से इन्हें ब्लॉगिंग करने की प्रेरणा मिली है। इनके अनुसार भावनाओं की अभिव्यक्ति साहित्य एवं नृत्य के माध्यम से करने का यह आरंभिक सिलसिला है। इनकी रुचि नृत्य,लेखन बेकिंग और साहित्य पाठन विधा में भी है। कुछ माह पहले ही लेखन शुरू करने वाली श्रीमती मित्रा गृहिणि होकर बस शौक से लिखती हैं ,न कि पेशेवर लेखक हैं।
Fri Dec 8 , 2017
दिल मेरा,पर इसमें, धड़कती हैं धड़कनें तुम्हारी। सांसें मेरी, पर चलती हैं सिर्फ तुम्हारे लिए। होंठ मेरे,पर मुस्कुरातें हैं, तुम्हें देखकर। और मेरी आँखें ? उसमें भी तो तुम्हारे ही सपने पलते हैं…! कई बार कोशिश की, पर समझ नहीं पाया, ‘मैं’ तुम हूं,या ‘तुम’ मैं ? क्या तुम समझ […]