लोगों के दिल छोटे
और घर बड़े हो गए,
बड़ा कमाल हुआ
इस सदी में विजय,
कपड़े छोटे और
सपने बड़े हो गए।
कमाई थी खुशियां
जिनके लिए हमने,
सियासी जंग में वो
सामने खड़े हो गए।
कमाए थे अपनों की
खातिर जो सिक्के,
कागज के वो टुकड़े
रिश्तों से बड़े हो गए॥
#विजयलक्ष्मी जांगिड़
परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़ जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।
Thu Nov 9 , 2017
जिंदगी खुली किताब की तरह है। विचारों में जरा खुलापन रखिए॥ रिश्ते यूँ ही नहीं बनते जिंदगी में। इनमें थोड़ा तो अपनापन रखिए॥ खुशबू की तरह महकते रहो। हर गरीब के काम आते रहो॥ रोशन करो झोपड़ी उनकी। फिर खुशी से चहकते रहो॥ भगवान ने कितने सुन्दर चरित्र किए। हर […]