घर का दीपक,
बेटा होता है।
कुटुम्ब परिवार
का नाम चलता है।
बेटी तो शादी के बाद
पति के घर
चली जाती है।
ससुराल में अपना ही
घर-परिवार बसाती है।
सदियों से ये परम्परा,
चली आई है
चलती जाएगी,
कानून में भी मान्यता है।
बेटी से भी ससुराल में,
बेटा-बेटी पैदा होते हैं।
बेटी बड़ी होने पर पति
के साथ ससुराल जाती है।
बेटा घर का दीपक होता है,
घर-परिवार का नाम पढ़
लिखकर रोशन करता है।
हर जाति,हर धर्म,हर
परिवार में यही होता है।
ईश्वर ने बेटा-बेटी ही,
संतान के रूप में बनाए हैं।
बेटा घर का दीपक बनता है,
बेटी का घर शादी के बाद
पति के साथ पति का
ही घर परिवार होता है।
बेटा-बेटी का रिश्ता,
माता-पिता को बराबर
एक समान होता है।
घर-परिवार रीति-रिवाज
परम्पराओं से चले हैं।
प्रकृति ने जो बनाया है,
हम सब उसे निभाते हैं।
श्रद्धाभाव से पालन करते हैं॥
#अनन्तराम चौबे
परिचय : अनन्तराम चौबे मध्यप्रदेश के जबलपुर में रहते हैं। इस कविता को इन्होंने अपनी माँ के दुनिया से जाने के दो दिन पहले लिखा था।लेखन के क्षेत्र में आपका नाम सक्रिय और पहचान का मोहताज नहीं है। इनकी रचनाएँ समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं।साथ ही मंचों से भी कविताएँ पढ़ते हैं।श्री चौबे का साहित्य सफरनामा देखें तो,1952 में जन्मे हैं।बड़ी देवरी कला(सागर, म. प्र.) से रेलवे सुरक्षा बल (जबलपुर) और यहाँ से फरवरी 2012 मे आपने लेखन क्षेत्र में प्रवेश किया है।लेखन में अब तक हास्य व्यंग्य, कविता, कहानी, उपन्यास के साथ ही बुन्देली कविता-गीत भी लिखे हैं। दैनिक अखबारों-पत्रिकाओं में भी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। काव्य संग्रह ‘मौसम के रंग’ प्रकाशित हो चुका है तो,दो काव्य संग्रह शीघ्र ही प्रकाशित होंगे। जबलपुर विश्वविद्यालय ने भीआपको सम्मानित किया है।
Sat Oct 7 , 2017
धनिया धनवन्ती जी बनकर, झाड़ू-पोंछा-बर्तन तज कर बनकर सुशिक्षिता गाँवों में, अपना उद्योग चलाएगी। कोई न किसी का चर होगा, मजदूर-कृषक साक्षर होगा जब रधिया कोरे कागज पर, अंगूठा नहीं लगाएगी। जब तज कर यह बंदूकराज, आतंकहीन होगा समाज कोई गोली आकर गांधी का, सीना चीर न पाएगी। फिर मिलकर […]