रेलगाड़ी का सफर,
सुन्दर सुहाना
मनभावन लगता है।
कोई साथी
मिल जाए सफर में,
सुहाना कटता है।
सफर में कभी-कभी,
कोई हमसफर
मिल जाता है।
रेलगाड़ी का सफर
बस बात-ही-बात
में निकल जाता है।
कोई हमसफर हो,
कोई हमउम्र हो।
नैनों के इशारो से,
ही बात हो जाती है।
कभी शरमो-हया से,
आँख झुक जाती है।
कभी पलकें झुकाने,
कभी पलकें उठाने
कभी नजरें चुराने में,
भी बात हो जाती है।
छोटा सफर तो बस,
नजरें मिलाने और
नजरें चुराने में ही
निकल जाता है।
बातों की शुरुआत हो,
उतरने का ही
स्टेशन आ जाता है।
मन की मुरादों का,
ये रेलगाड़ी का
सफर शुरु होते ही
समाप्त हो जाता है।
बस यादों का सहारा
बाकी रह जाता है॥
#अनन्तराम चौबे
परिचय : अनन्तराम चौबे मध्यप्रदेश के जबलपुर में रहते हैं। इस कविता को इन्होंने अपनी माँ के दुनिया से जाने के दो दिन पहले लिखा था।लेखन के क्षेत्र में आपका नाम सक्रिय और पहचान का मोहताज नहीं है। इनकी रचनाएँ समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं।साथ ही मंचों से भी कविताएँ पढ़ते हैं।श्री चौबे का साहित्य सफरनामा देखें तो,1952 में जन्मे हैं।बड़ी देवरी कला(सागर, म. प्र.) से रेलवे सुरक्षा बल (जबलपुर) और यहाँ से फरवरी 2012 मे आपने लेखन क्षेत्र में प्रवेश किया है।लेखन में अब तक हास्य व्यंग्य, कविता, कहानी, उपन्यास के साथ ही बुन्देली कविता-गीत भी लिखे हैं। दैनिक अखबारों-पत्रिकाओं में भी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। काव्य संग्रह ‘मौसम के रंग’ प्रकाशित हो चुका है तो,दो काव्य संग्रह शीघ्र ही प्रकाशित होंगे। जबलपुर विश्वविद्यालय ने भीआपको सम्मानित किया है।
Mon Nov 6 , 2017
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