उच्च पद पर बैठकर ये काम तो मत कीजिए,
सर वतन के नाम ये इल्जाम तो मत कीजिए।
जी रहे हैं साथ सदियों से अमन से चैन से,
देश की अवाम को बदनाम तो मत कीजिए।
डर रहे हैं वो बसा है चोर जिनके दिल जिगर,
खा रहे हैं भय वही बदज़ात है जिनकी नज़र।
देश का कानून तो सबके लिए है एक-सा,
देशद्रोही मानते कब देश को अपना मगर।
नाम लेकर धर्म का मत जुल्म औरत पर करो,
आप इन अय्याशियों को धर्म के मत सर धरो।
देश के कानून को हक है करे हर फैसला,
धर्म का देकर हवाला मत किसी का हक हरो।
देश है जब एक तो,कानून भी फिर एक हो,
क्यूँ डरेगा वो किसी से काम जिसका नेक हो।
देश धर्मों से नहीं, चलता सदा कानून से,
फर्ज है सबका सदा कानून का अभिषेक हो॥
#सतीश बंसल
परिचय : सतीश बंसल देहरादून (उत्तराखंड) से हैं। आपकी जन्म तिथि २ सितम्बर १९६८ है।प्रकाशित पुस्तकों में ‘गुनगुनाने लगीं खामोशियाँ (कविता संग्रह)’,’कवि नहीं हूँ मैं(क.सं.)’,’चलो गुनगुनाएं (गीत संग्रह)’ तथा ‘संस्कार के दीप( दोहा संग्रह)’आदि हैं। विभिन्न विधाओं में ७ पुस्तकें प्रकाशन प्रक्रिया में हैं। आपको साहित्य सागर सम्मान २०१६ सहारनपुर तथा रचनाकार सम्मान २०१५ आदि मिले हैं। देहरादून के पंडितवाडी में रहने वाले श्री बंसल की शिक्षा स्नातक है। निजी संस्थान में आप प्रबंधक के रुप में कार्यरत हैं।