‘आशा’  की आशा

shashank sharma1
नौ माह कोख में,पाला था,
दिया अपना उसे,निवाला था।
जब गई, इस दुनिया से,
कोई न,देखने वाला था॥
उस बेचारी,माता की,
क़िस्मत ही जैसे,फूट गई…
‘आशा’ की आशा,छूट गई॥
दर्द में कराहती,वो माता,
कोई बचाने,क्यों आता।
गैरों की क्या,बात करें,
भूला वो जिससे,था नाता॥
दसवें माले में,कब जाने,
साँसें भी थी,रूठ गई…
‘आशा’ की आशा,छूट गई॥
उच्च शिक्षा,बच्चों को देते,
पर संस्कारों पर,ज़ोर नहीं।
ऐसे बच्चे, गर हो जाएं
उस निशा की,कोई भोर नहीं॥
पैसा प्रधान,सिखाया हमने,
अब दौलत ही सब,लूट गई…
‘आशा’  की आशा,छूट गई॥

                                                                                     #शशांक दुबे

परिचय : शशांक दुबे पेशे से उप अभियंता (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना), छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश में पदस्थ है| साथ ही विगत वर्षों से कविता लेखन में भी सक्रिय है |

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