पांच मुक्तक

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vikram

1. बसा है जो मेरे मन में वो अब कहने की बारी है

   कि मेरे दिल के आईने में बस सूरत तुम्हारी है
   जो पूछा मैंनें यारों से बताओ क्या हुआ है ये
   कोई कहता मोहब्बत है कोई कहता बीमारी है
2 नहीं आता समझ में ये कि क्यों ऐसा ही होता है
जो होना नापसंद दिल को क्यों वैसा ही होता है
अभी के दौर में इंसान की नहीं कद्र है कोई
इंसानों की कद्रों में तो बस पैसा ही होता है
3 किसी ने तन को अपनाया किसी ने धन को अपनाया
जिसे विश्वास ईश्वर पर भजन किर्तन को अपनाया
मगर एक मन मिला मुझको जो कोरे कागज के जैसा था
मैंनें छोड़कर सबकुछ बस उस मन को अपनाया
3. करो कुछ भी जमाने का ये दस्तूर है लेकिन
    किसी की याद आई थी वो मुझसे दूर है लेकिन
    कमी खलती है फिर भी परेशां नहीं हूं ये सोचकर
    जो मेरे पास मेरे यार हैं कोहीनूर हैं लेकिन
4. जो करता है एक फूल वो गुलदस्ता नहीं करता
    मंजिलें जो करती हैं वो रस्ता नहीं करता
    भले नाते इस संसार में बन जाएं कई गहरे
     तुलना मां के आंचल से कोई रिश्ता नहीं करता
5. बनो सरल कठोरता में रस नहीं आता
    कोई शौक से बन कर के बेबस नहीं आता
    चले गए अगर पैसे तो वे फिर आ भी सकते हैं
     चला जाए कोई इंसान तो वापस नहीं आता
विक्रम कुमार 
 वैशाली(बिहार)

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।