जिन्दगी नहीं है किसी पतंग से कम,
आकर उड़ा लो अगर हो दम-खम।
आओ पतंग से जिन्दगी के फलसफे को समझते हैं,
बताते हैं उन्हें इसकी रंगत जो इसे बकवास समझते हैं।
पतंग में भी होती है जातियां-नर और मादा,
ढग्गा या ढांच पाता है पुरूषों-सा मान ज्यादा।
तुक्कल या पुछंडी,नारी की तरह कम मान पाती है,
भारतीय आकाश में ये प्राय: ३३ प्रतिशत ही पाई जाती है।
ठुनकी से बढ़ती और चढ़ती है पतंग,
मंजिल पर पहुंच शान से सजती है पतंग।
स्थिर सजी हुई पतंग देती है जोश,
डोर उसकी थामना डगमगाता है होश।
जिसने उड़ा ली कम हवा में पतंग,
जिसने सम्हाल ली तेज हवा में पतंग..
समझो जीवन के झंझावातों से पार पा गया,
जैसे उतार-चढ़ाव के बीच उसे जीना आ गया।
पतंग के जोते जीवन संतुलन का पर्याय हैं,
यह जिन्दगी की उड़ान का मुख्य अध्याय है।
जिसे जोते बांधना आ गया,
समझो साम्य बैठाना आ गया।
कांप ठुड्डों में झांकती है पतंग की प्रकृति,
पतंग छांटने से समझ आती है चयन प्रकृति।
पतंग की उड़ान जिन्दगी की उड़ान से कम नहीं है,
इधर आक्सीजन तो उधर हवा के बिना दम नहीं है।
पतंग की तरह जिन्दगी का आसमान भी अनन्त है,
चक्री की डोर खत्म होते ही उड़ान का अंत है।
जिसे खुले आसमान में पेंच लड़ाना आ गया,
समझो वह जिन्दगी की मंजिल पा गया।
जो खींचमखांच में लाड़ी ले आया,
जैसे उसने जीवन मकसद पाया।
जितनी आकर्षक पतंगें,उतने आकर्षक नाम,
कटती है सदा डोर,होती है पतंग बदनाम।
कटे सिर वाली सिरकटी,आंखों वाली आंखबाज,
दो पट्टे वाली पटियल,कान हों जिसके कानबाज।
डंडे वाली डंडियल,चांद वाली चांदबाज,
चार रंग का चौकड़िया,मांग वाला मांगबाज।
तीन रंग का तिरंगा,ग्लास जैसा ग्लाशिया,
सिंगोड़े वाला सिंगोड़िया,सितारे वाला सितारिया।
जितनी रंग-बिरंगी पतंगें,उतना सपन सजीला संसार,
बिन आसमानी ख्वाबों के मानो रंगीन दुनिया बेकार।
जिन्दगी है पतंग,जब तक सांस है उड़ा लो,
ठुनकी मार-मार,कंधे उचका इसे बढ़ा लो।
डोर कटने से पहले,सांझ ढलने से पहले,
आस टूटने से पहले,सांस थमने से पहले…
जिन्दगी की पतंग हाथ से छूटने न पाए,
नियति से पहले उम्मीद की डोर टूटने न पाए॥
#डॉ. देवेन्द्र जोशी
परिचय : डाॅ.देवेन्द्र जोशी गत 38 वर्षों से हिन्दी पत्रकार के साथ ही कविता, लेख,व्यंग्य और रिपोर्ताज आदि लिखने में सक्रिय हैं। कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई है। लोकप्रिय हिन्दी लेखन इनका प्रिय शौक है। आप उज्जैन(मध्यप्रदेश ) में रहते हैं।