नया सवेरा

devendr soni
रूप लावण्य और संस्कारों की धनी रूपा ने जब अपने यौवन में कदम रखा तो उसके मन में अनेक सुनहरे सपने खिलने लगे ।
सदा खिलखिलाती रूपा – अक्सर गुनगुनाती रहती थी – वो सुबह कभी तो आएगी … !
कई बार जानकर भी अनजान बनते हुए मैने उससे पूछा था , इस गाने के पीछे छुपे भावों को पर वह हौले से मुस्कुरा कर टाल जाती ।
कभी कभी कहती – कुछ नहीं भाई । ये पंक्ति मुझे घर की कमजोर परिस्थितियों से जूझने की प्रेरणा देती हैं।
रूपा मुझसे ऐसा कह जरूर देती थी मगर मैं समझता था इसके पीछे छुपा उसका दर्द । जानता था उसके घर के हालात ठीक नहीं । स्वाभिमानी पिता सब कुछ छोड़ – छाड़ कर तंगहाली का जीवन जी रहे थे । कुछ भी काम उन्हें उनकी उच्च शिक्षा के अनुरूप नहीं लगता । दो बेटे पिता की बेरुखी और तंगहाली से परेशान होकर दूसरे शहरों में जा बसे थे । उन्हें घर के हालातों से कोई लेना – देना नहीं था ।
हारकर और अपने सपनों को मारकर रूपा एक अशासकीय संस्थान में काम करने लगी ।  घर में मां सिलाई – कढ़ाई कर लेती । जिंदगी तो कट रही थी  पर अब रूपा की वह खिलखिलाहट धीरे – धीरे गुम होती जा रही थी । हां ,अब भी अक्सर गुनगुनाती जरूर थी – वो सुबह कभी तो आएगी ।
….. और आख़िरकार एक दिन वो सुबह भी आ ही गई जब रूपा दुल्हन बनी अपने ससुराल चली गई । साल भर सब कुछ ठीक ठाक रहा पर ये सुबह , रूपा के की वह सुबह नहीं थी जो उसके जीवन को उजास से भर पाती ।
नियति ने कुछ और ही लिख रखा था रूपा के जीवन में । फिर आई वह अँधेरी रात भी , जिसने ह्रदयाघात से छीन लिया उसके पति को । बज्र सा प्रहार हुआ था रूपा पर । पति के जाने के बाद ससुराल में कितने दिन प्रताड़ित होकर रहती रूपा । वापस आ गई मायके अपने ।
रूपा के मजबूर पिता भी यही चाहते थे । रूपा मायके में रहकर ही पुनः नोकरी करने लगे ताकि घर में मदद मिल सके । उन्हें रूपा की भावनाओं की कद्र हो ऐसा उनके व्यवहार से कभी लगता नहीं था । रूपा भी क्या करती , जाने लगी फिर से काम पर । अब वह न तो गुनगुनाती थी और न ही खिलखिलाती थी । मुझसे भी कम ही बात करती थी ।
आखिर रक्षाबंधन के दिन जब रूपा ने मेरी कलाई पर राखी बांधना चाहा तो मैने पहली बार अपना हाथ  पीछे खींच लिया । वह अचकचा गई ।
बोली – भैय्या । ये क्या ।
क्या आपकी यह अभागन विधवा बहन अब राखी बांधने के योग्य भी नहीं रही । बचपन से मैने आपको राखी बांधी है , कभी आपने अपना हाथ नहीं खींचा । फिर आज ये क्यों ? कहते हुए फफक पड़ी थी रूपा ।
अपने सीने से लगाते हुए रुंधे गले से कहा था – मैंने – नहीं रे रूपा । ऐसा सोचा भी कैसे तूने ।
हाँ , रुचना लगाने से पहले आज पहली बार तेरा ये भाई तुझे कुछ देना नहीं बल्कि कुछ मांगना चाहता है । बोल – करेगी अपने इस भाई की इक्षा पूरी ।
वह कुछ कहती , इससे पहले ही मैने कहा –  तुझे फिर से शादी करना होगा । पूरा जीवन पड़ा है अभी । मायके में भी ज्यादा दिन नहीं रह पाएगी रूपा। समझदारी से जीवन चलाना होता है। यह जरूरी नहीं कि जो एक बार घट गया वह दुबारा भी घटे । किसी की चिंता मत कर और अपने भविष्य के बारे में सोच ।
यह सुन ,  भींग गई थी पलकें रूपा की । उसने मेरी कलाई आगे खींची और बांध दिया – रक्षासूत्र ।
यह कहते हुए – वो सुबह भी कभी तो आएगी ही …….और फिर आई एक दिन वह नई सुबह भी जब मंदिर के प्रांगण से विदा हो गई नया संसार बसाने रूपा ।

 #देवेन्द्र सोनी , इटारसी 

matruadmin

Next Post

मुस्कुरा भी दिया करो.....

Tue Jun 19 , 2018
कभी  कभी मुस्कुरा भी दिया करो यारों, चेहरे  पर उदासियां अच्छी नहीं लगती । माना  गम  बहुत  है  इन  राहों  में  मगर, जिंदगी में मायूसियां अच्छी नहीं लगती। उदासियां  थामती  है निराशा का दामन, और  मायूसियां  घोर  अंधेरे फैलाती है । मगर  मेरे  यार,  चेहरे की मुस्कुराहट तो, अमावस की […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।