
गाड़ी जब रुकेगी जाम में
या लाल बत्ती पर,
तो आएगा कोई साँवला-सा लड़का,
शीशा साफ़ करेगा।
हमारे रोकने पर भी नहीं रुकेगा,
और फिर पारदर्शी दीवार के बाहर
खड़ा रहेगा दो क्षण।
पैसे न मिलने पर गिड़गिड़ाएगा,
धीमे स्वर में
जैसे मंत्र पढ़ रहा हो।
फिर भी यदि हम
अंधे-बहरे बने बैठे रहें,
तो वह निर्लिप्त-सा चल देगा
किसी दूसरी गाड़ी की ओर,
वहाँ फिर यही सब दोहराएगा।
एक कमज़ोर औरत आएगी
कमर पर एक दूधकट्टू नंगा बच्चा लिये,
अपने मुँह पर
अपनी पाँचो उंगलियाँ जोड़ेगी
कौर की तरह,
बच्चे को दिखा-दिखाकर
हाथ पसार देगी।
बाज़ार में चलते हुए
कोई बच्चा मिलेगा,
काला, मैला, दुर्बल और फटेहाल,
“बाबू! खाने के लिए पैसे दे दो।”
आगे बढ़ने पर कूड़े का ढेर मिलेगा,
दो जीव दिखाई देंगे,
कुछ सूँघते हुए कुत्ते
और कचरा बीनते हुए बच्चे।
गाड़ियाँ चली जाएँगी अपनी राह
लोग चले जाएँगे अपने घर।
#अंजना वर्मा, बैंगलुरू

