प्रेम सहज है,
प्रेम सरल है,
प्रेम अचल है,
प्रेम अटल है।
प्रेम अतुल है,
प्रेम मृदुल है,
प्रेम मधुर है,
प्रेम सुघर है।
प्रेम शांत है,
प्रेम क्लांत है,
प्रेम वर्तमान है,
प्रेम प्रसाद है।
प्रेम अनुभूति है,
प्रेम प्रतीति है,
प्रेम कलाकृति है,
प्रेम प्रकृति है।
प्रेम है तो सब है,
प्रेम नहीं तो कुछ नहीं,
प्रेम ही जीवन का सार है,
प्रेम बिना जग असार है।
#अरविंद ताम्रकार ‘सपना’
परिचय : श्रीमति अरविंद ताम्रकार ‘सपना’ की शिक्षा एमए(हिन्दी साहित्य)है।आपकी रुचि लेखन और छोटे बच्चों को पढ़ाने के साथ ही जरुरतमंद की सामर्थ्यानुसार मदद करने में है।आप अपने रचित भजन खुद गाकर व लेखन द्वारा अपने मनोभावों को चित्रित करती हैं। सिवनी(म.प्र.)के समता नगर में आप रहती हैं।
Sat Jun 17 , 2017
सुनेगी क्या कभी दरकार अपनी, हमीं से जो बनी सरकार अपनी। चमन में लौट आई फिर बहारें, बचाकर जान भागे खार अपनी। दिखाई है हमें औकात उसने, करेंगे हद नहीं अब पार अपनी। खिलाएं क्या,भरण कैसे करें अब, जो मारे कीमतें भी मार अपनी। न कोई आरज़ू ही रब से […]