
इश्क की ठंडी छांव में तेरी,
आंख मेरी लग जाती है ।
दिन गुज़रता सोच कर तुझको,
शामें उदास हो जाती है ।।
हाथों की ये लकीरें मेरी ,
तुम्हें नसीब कहती हैं ।
धड़कने मेरे सीने में ,
नाम तुम्हारा लेती हैं ।।
कितना पागल है दिल मेरा,
याद तुझे ही करता है ।
पल पल तड़पता रहता है,
पर इश्क तुम्हीं से करता है ।।
#डॉ.वासीफ काजी
परिचय : इंदौर में इकबाल कालोनी में निवासरत डॉ. वासीफ पिता स्व.बदरुद्दीन काजी ने हिन्दी में स्नातकोत्तर किया है,साथ ही आपकी हिंदी काव्य एवं कहानी की वर्त्तमान सिनेमा में प्रासंगिकता विषय में शोध कार्य (पी.एच.डी.) पूर्ण किया है | और अँग्रेजी साहित्य में भी एमए कियाहुआ है। आप वर्तमान में कालेज में बतौर व्याख्याता कार्यरत हैं। आप स्वतंत्र लेखन के ज़रिए निरंतर सक्रिय हैं।
Thu Aug 30 , 2018
ढूंढाड़ी क्षेत्रीय परम्परा व भाषा मे बाल विवाह न करने की प्रेरणा देने वाली रचना ——————- आइ रे आइ रे आखा तीज, लाडू पुड़ी मिठाई….. चीज। टाबर ब्याह का बुवगा बीज, आइ रे आइ रे.आखा तीज। बापू ल्यायो नई कमीज, चढ़ बा बरबादी दहलीज। कैवे बाप आपणै टाबर नै, बेटा […]