पुस्तक समीक्षा : यशोधरा भटनागर का लघुकथा संग्रह ‘खिड़की’

लघुकथाओं में प्रयोग स्थापित – पंकज त्रिवेदी

खिड़की (लघुकथा संग्रह)
लेखिका : यशोधरा भटनागर
प्रकाशन-संस्मय प्रकाशन,
8 सी.एस.पी., ए.डी. ब्लॉक, शालीमार बाग़, दिल्ली-110088
मूल्य- 220/-
संपर्क : 07067455455

यशोधरा भटनागर की सृजनात्मक शक्ति में नयापन, लचीलापन और लयात्मक अभिगम है। सुप्रसिद्ध रचनाकार तो हम कह देते हैं मगर रचनाकार से बड़ी रचना होती है। जब रचना प्रसिद्ध होने के बाद सुप्रसिद्ध होती है, वही रचनाकार की पहचान बनाती है।

यशोधरा भटनागर की कुछेक लघुकथाएँ पढ़ी हैं। लघुकथा का स्वरूप जितना कोमल, जितना सटीक, जितना तीक्ष्ण है, उसमें एक भय स्थान यही कि वो मछली की तरह कब हाथ से निकल जाए और हम लघुकथा के बदले कोई किस्सा बनाकर हाथ मसलने लगें।

रचनाकार की सतर्कता, अभ्यास और भाव के बहते प्रवाह की गति के साथ एक पल में चमत्कार करके दिखाने का मौका है – लघुकथा।

यशोधरा भटनागर जी का लघुकथा संग्रह – ‘खिड़की’ – को पोस्टमैन ने दरवाज़े से सरका दिया। पहले से सूचना मिली थी, कि मेरे पास वो ‘खिड़की’ आएगी, जिसमें यशोधरा जी की आँखों से मुझे बाहर की दुनिया देखनी है। पठन प्रक्रिया में अगर सशक्त रचना हाथ लग जाए तो रचनाकार के सृजन समय की अनुभूति को समानांतर पाठक भी पहुँच जाता है, जिसे लोग रचनाकार की सफलता मानते हैं। हालांकि उसमें भी एक भयस्थान है, वो यह कि इतने समानांतर चलने में पाठक अनुसरण की उस चोटी पर पहुंचते हुए भी स्वयं को अलग रख पाए, वो ज़रूरी है। रचनाकार की रचना के साथ सफ़र करते हुए स्वयं के नज़रिए से विवेकपूर्ण मूल्यांकन करता रहे, तभी रचनाकार और पाठक की जुगलबंदी और सफलता सिद्ध होगी। यह मेरा व्यक्तिगत मत ज़रूर है, फिर भी यहाँ लिख रहा हूँ।

इस संकलन में 89 लघुकथाएँ हैं। ‘खिड़की’ लघुकथा में हॉर्न बजाती ट्रेन धीरे-धीरे सरकने लगती है। गार्ड ने हरी झंडी दिखाई है। एक नववधू सिमटकर खिड़की के पास बैठी है। जब सबकुछ पीछे छूटता है और उनका पति आशु का साँवला चेहरा मुस्कराता है।

“प्रिय! थक गई होगी, थोड़ा आराम कर लो।” के संवाद के साथ….. और खिड़की बंद हो जाती है। इस संवाद और खिड़की के बंद होने के बीच लघुकथा का चमत्कार या चोट है। इसके लिए आपको लघुकथाएँ पढ़नी होंगी।

उत्कृष्ट लघुकथाओं का यह संग्रह प्रवाह में बहती लघुकथाओं से अलग है। इसलिए स्वयं को रोक नहीं पाया और इतना सारा लिख दिया। यशोधरा भटनागर जी को बधाई।

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पंकज त्रिवेदी,

(साहित्यकार एवं विश्वगाथा के संपादक)
सुरेंद्रनगर, गुजरात

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