रोशनी को ढूँढता है

लगता है हमारा आपका
साथ बस यही तक था।
आप अपने आप को
बहुत व्यस्त समझते हो।
और सामने वाले को
अपने से कम समझते हो।
जबकि सामने वाला व्यस्त
होते हुये भी दोस्तो से मिलता है।
हमारी और तुम्हारी सोच में
यही बहुत बड़ा फर्क है।
इसलिए दोस्त आप मस्त रहो
और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।।

अपने आपको तुम कभी
दुसरो के लिए जी कर देखो।
अपने काम का जिक्र इतना
न करो की समाने वाला।
अपने आपको खुद शर्मीदा
अपनी ही नजरो में समझे।
जबकि वो मिलने मिलाने में
अपनी जिंदगी को जीता है।
खुद खुश रहता है और
औरों को भी खुश करता है।
ऐसे इंसान को समाज और
आप क्या कहते हो आप जनो।।

हर किसी को इंसान खुश
इस जमाने में कर नहीं सकता।
घाव जो दिल पर लगे उसे
समय से पहले भर नहीं सकता।
लाख चापलूसी करे वो इंसान पर
सामने वाले के दिलको पड़ लेता है।
और फिर अपनी जिंदगी को वो
फिरसे अपने अनुसार जीता हैं।
छोड़ देता है साथ ऐसे लोगों का
जो खुदके सिवाए औरों के नहीं।
इसलिए तो कवि लेखक सदा ही
अंधेरो में रोशनी की किरण ढूँढता है।।

जय जिनेंद्र देव
संजय जैन “बीना” मुंबई

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