
ज़माना मुझे आजमाता गया
मगर मैं हमेशा मुस्कुराता गया
मुझे जो समझ लें वो मिलते नहीं
ग़मों को अकेला उठाता गया
सभी दोस्त मेरे ,न दुश्मन कोई
मिला जो गले से लगाता गया
लबों पर हँसी की अदाएँ रखे,
ग़ज़ल मैं नई गुनगुनाता गया
ज़रा मस्तियाँ देख अंदाज में
ज़माने में खुशियाँ लुटाता गया
#किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट

