बस्तों के बोझ तले दबता बचपन

0 1
Read Time3 Minute, 51 Second

chandrakanta sivan

‘शाख से पत्ता कोई जुदा नहीं होता।

रोता है अब बचपन,बच्चा नहीं रोता।।’

किसी भी देश की संस्कृति,भाषा, साहित्य के सर्वांगीण विकास में शिक्षा का बहुमूल्य योगदान है। शिक्षा ही वो माध्यम है,जिसके अनुरूप अपने जीवन मूल्यों,संस्कृति व किसी देश की बहुमुखी प्रतिभा का आंकलन किया जा सकता है। भारत में साक्षरता का आंकड़ा सूर्योदय की प्रथम किरण मात्र है,आजादी के वर्षों बाद भी शिक्षा की गति मद्धम ही रही,परन्तु नब्बे के दशक के बाद शिक्षा ने जिस तरह से आधुनिकता का चोला ओढ़े अपने पाँव पसारे,उसका सीधा प्रभाव हमारे बच्चों पर पड़ा, और रही सही कसर अंग्रेजी ने पूरी कर दी है।
आधुनिक शिक्षा जिस तरह हमारी संस्कृति पर हावी होती जा रही है,वरन हमारे बच्चों पर भी सामान्य से भी अधिक बोझ बनती जा रही है। अपितु इससे बच्चों का शारीरिक व मानसिक संतुलन भी प्रभावित हो रहा है। बच्चे पहले जहां अपनी पढ़ाई के साथ-साथ माता-पिता के दैनिक कार्यों में भी सहायता करते थे,और शाम होते ही चौगान में अपने खेलकूद के क्रिया कलापों में भी अपना जी भर के मनोरंजन करते थे,जिससे मन और दिमाग में ऊर्जाप्रवाह बनी रहती थी, वहीं आज किताबों के बोझ से बस्ते भारी हो रहे है।
फलस्वरुप बच्चों में अपरिवर्तनीय विकृति विकसित कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है की सभी बच्चों में से आधा १४ साल की उम्र के बच्चे पीठ दर्द औऱ आँखों की परेशानी से परेशान हैं। चिकित्सकों के अनुसार इसे  ‘स्कोलियोसिस’ के रूप में जाना जाता है। विकिरण कर्वेटर सहित विद्यार्थियों में रीढ़ की हड्डी में असामान्यता के मामलों में भी वृद्धि हुई है।
अतिभारित स्कूल बैग,जो दस साल पहले किए गए लोगों के आकार को दोगुना करने के लिए किए गए सर्व पर है,अब औऱ बड़ा हो गया है।आठ-नौ साल के किशोर बच्चे तो ठीक,यहां तक कि वयस्क भी आत्महत्या कर रहें हैं।

आज बच्चे अपने शरीर के वजन का  एक चौथाई तक ले जा रहे हैं,जो  वयस्क के  लिए भी परेशानी वाला काम है। वर्तमान में इस समस्या के समाधान की आवश्यकता है।

‘खो गई रे हँसी,
खो गया रे बचपन..
बस्तों के बोझ तले 
दबता बचपन..।’

हमें इस मुद्दे पर एक त्वरित अवलोकन करने की आवश्यकता है। ‘माता-पिता को बच्चों के बैकपैक्स पर नज़र रखने की जरूरत है,ताकि वे बड़े होकर अपने स्वास्थ्य के लिए समस्याएं पैदा न करें।
हम अभिभावक,स्कूल और प्रशासन को भी ये सुनिश्चित करना होगा,कि हमारे बच्चों का वर्तमान ही नहीं,भविष्य भी सुंदर,सुव्यवस्थित बनाने की और कड़े कदम उठाने की जरूरत है। आज की विचारशील सोच ही हमारे नौनिहालों की ज़िन्दगी को  सुखमय खुशियों से भर सकती है।

कान्ता #चन्द्र सिवाल ‘चन्द्रेश’

matruadmin

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

अब गांव,गांव न रहा

Mon May 15 , 2017
अब वो गांव,गांव न रहा। वो माटी में माटी का भाव न रहा। गांव को देखा तो मेरे गांव से मुंशी प्रेमचंद का गांव छूमंतर नजर आया। अब गांव में बहुत-सा अंतर नजर आया। अब सचमुच मेरा गांव बदल गया है। गांव को भी अब शहर निगल गया है।। अब […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।