बस्तों के बोझ तले दबता बचपन

chandrakanta sivan

‘शाख से पत्ता कोई जुदा नहीं होता।

रोता है अब बचपन,बच्चा नहीं रोता।।’

किसी भी देश की संस्कृति,भाषा, साहित्य के सर्वांगीण विकास में शिक्षा का बहुमूल्य योगदान है। शिक्षा ही वो माध्यम है,जिसके अनुरूप अपने जीवन मूल्यों,संस्कृति व किसी देश की बहुमुखी प्रतिभा का आंकलन किया जा सकता है। भारत में साक्षरता का आंकड़ा सूर्योदय की प्रथम किरण मात्र है,आजादी के वर्षों बाद भी शिक्षा की गति मद्धम ही रही,परन्तु नब्बे के दशक के बाद शिक्षा ने जिस तरह से आधुनिकता का चोला ओढ़े अपने पाँव पसारे,उसका सीधा प्रभाव हमारे बच्चों पर पड़ा, और रही सही कसर अंग्रेजी ने पूरी कर दी है।
आधुनिक शिक्षा जिस तरह हमारी संस्कृति पर हावी होती जा रही है,वरन हमारे बच्चों पर भी सामान्य से भी अधिक बोझ बनती जा रही है। अपितु इससे बच्चों का शारीरिक व मानसिक संतुलन भी प्रभावित हो रहा है। बच्चे पहले जहां अपनी पढ़ाई के साथ-साथ माता-पिता के दैनिक कार्यों में भी सहायता करते थे,और शाम होते ही चौगान में अपने खेलकूद के क्रिया कलापों में भी अपना जी भर के मनोरंजन करते थे,जिससे मन और दिमाग में ऊर्जाप्रवाह बनी रहती थी, वहीं आज किताबों के बोझ से बस्ते भारी हो रहे है।
फलस्वरुप बच्चों में अपरिवर्तनीय विकृति विकसित कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है की सभी बच्चों में से आधा १४ साल की उम्र के बच्चे पीठ दर्द औऱ आँखों की परेशानी से परेशान हैं। चिकित्सकों के अनुसार इसे  ‘स्कोलियोसिस’ के रूप में जाना जाता है। विकिरण कर्वेटर सहित विद्यार्थियों में रीढ़ की हड्डी में असामान्यता के मामलों में भी वृद्धि हुई है।
अतिभारित स्कूल बैग,जो दस साल पहले किए गए लोगों के आकार को दोगुना करने के लिए किए गए सर्व पर है,अब औऱ बड़ा हो गया है।आठ-नौ साल के किशोर बच्चे तो ठीक,यहां तक कि वयस्क भी आत्महत्या कर रहें हैं।

आज बच्चे अपने शरीर के वजन का  एक चौथाई तक ले जा रहे हैं,जो  वयस्क के  लिए भी परेशानी वाला काम है। वर्तमान में इस समस्या के समाधान की आवश्यकता है।

‘खो गई रे हँसी,
खो गया रे बचपन..
बस्तों के बोझ तले 
दबता बचपन..।’

हमें इस मुद्दे पर एक त्वरित अवलोकन करने की आवश्यकता है। ‘माता-पिता को बच्चों के बैकपैक्स पर नज़र रखने की जरूरत है,ताकि वे बड़े होकर अपने स्वास्थ्य के लिए समस्याएं पैदा न करें।
हम अभिभावक,स्कूल और प्रशासन को भी ये सुनिश्चित करना होगा,कि हमारे बच्चों का वर्तमान ही नहीं,भविष्य भी सुंदर,सुव्यवस्थित बनाने की और कड़े कदम उठाने की जरूरत है। आज की विचारशील सोच ही हमारे नौनिहालों की ज़िन्दगी को  सुखमय खुशियों से भर सकती है।

कान्ता #चन्द्र सिवाल ‘चन्द्रेश’

matruadmin

Next Post

अब गांव,गांव न रहा

Mon May 15 , 2017
अब वो गांव,गांव न रहा। वो माटी में माटी का भाव न रहा। गांव को देखा तो मेरे गांव से मुंशी प्रेमचंद का गांव छूमंतर नजर आया। अब गांव में बहुत-सा अंतर नजर आया। अब सचमुच मेरा गांव बदल गया है। गांव को भी अब शहर निगल गया है।। अब […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।