शि‍क्षक का पत्र बच्चों के नाम …


प्रिय बच्चों,
नमस्कार।

प्रिय बच्चों , जब नन्हें पावों से तुम शाला की सीढ़ियां नापते तो तुम्हारे नन्हें पांव वामन की तरह विराट विश्व को नापते लगते। तुम्हारे मुख मंडल पर खिली मुस्कान बरबस ही मेरे मुस्कराने का कारण बन जाती। सुबह-सुबह तुम्हारा मुझे नमस्कार करना , “जय हिन्द” करना किसी शिशु का मां पुकारने पर मां की भांति खुश होने जैसा आल्हादित करता हूँ ।

प्रार्थना सभा में जब पूरे जज्बे,जोश और जुनून से तुम प्रार्थना करते तब तुम अपने को देश के अच्छे नागरिक के रुप में गढ़ रहे प्रतीत होते।

कहने को मैं तुम्हारा शिक्षक हूँ , किंतु जाने-अनजाने न जाने कितनी बार मैं तुमसे शिक्षा ग्रहण करता रहता हूँ । कभी किसी का तेजस्वी आत्मविश्वास मुझे चमत्कृत करता, तो कभी किसी की विलक्षण अभिव्यक्ति क्षमता अभिभूत कर देती। कभी किसी की उज्ज्वल सोच मेरे चिंतन को स्फुरित करती, तो कभी सम्मानवश मेरे लिए लाए फूल मुझे शब्दहीन कर‍ देते।

तुम्हारी स्फूर्ति -ऊर्जा से मुझे ऊर्जा मिलती। मैं सारे समय तरोताजा महसूस करता। तुम्हारी खिलखिलाहट , सजीवता और सक्रियता मेरे जीवन में खिलखिलाहट , सजीवता और सक्रियता लेकर आती। सच पूछो तो तुम मेरे जीवन में संजीवनी बूटी की तरह होते। तुम्ही से मैं जीवन रस प्राप्त करता रहता।

रविवार और अन्य अवकाश के दिन घर पर कांटे नहींं कटते। शाला के दिन सूरज जल्दी उगता ही नहीं लगता। शाला जाने की ललक मन में यों थाटें मारती कि मानों पंख होते तो उड़कर शाला पहुंच जाता । जानते हो ऐसा क्यों होता ? केवल तम्हारे मासूम चेहरे पर खिली तुम्हारी निश्छल मुस्कान और तुम्हारी ठहाकेदार हंसी का दीदार करने। और इसलिए भी कि तुम्हें बताने के लिए मेरे पास बातों का एक पूरा पहाड़ होता।

कक्षा में पढ़ाते-पढ़ाते जीवन के अनुभव साझा करता। पाठ्य सामग्री के इतर भी जीवनोपयोगी बातें बताता। तुम्हारा इन सब बातों को ध्यान से सुनना मुझे आश्वस्त करता। तुम निश्चित ही एक दिन अपने माता-पिता के लाड़ले बनकर बताओगे और उनके सपनों के साथ खुद के भी सपने पूरा करोगे यह मुझे आश्वस्त करता।

तुम्हारी आंखों में सपनों के समंदर साफ नजर आते तो हृदय से कोटि-कोटि आशीर्वाद निकलते। शिक्षक होने का अनुपम अहसास सुखद अनुभूति कराता।कई बार डांटता, दुख भी होता पर तूम कभी अन्यथा न लेते। मेरे प्रति सम्मान की भावना में कमी नहीं आती। मैं भावनाओं के अतिरेक में बोलता रहता अनवरत्-
अनथक…! ताकि तुम्हारे मन के तारों को झंकृत कर सकूं और ओजस्वी बना सकूं।

मेरे सुयोग्य सुशील बच्चों तुम, मेरे शिक्षक होने की सबसे अहम वजह होते। तुम्हारे धैर्य,अनुशासन और गरिमा से ही मेरी समझ,वैचारिकता और अभिव्यक्ति क्षमता समृद्ध और विस्तारित होती ।

तुम्हारी प्रफुल्लता ही मेरे अध्यापन की प्रेरणा बनती। तुम्हारी प्रखर मनीषा और जिज्ञासु संस्कार ही मुझे निरंतर पठन-अध्ययन के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करते । तुम्हारी जिज्ञासा और मेरे प्रति तुम्हारा सम्मान मेरे विश्वास को बढ़ाता। तुम्हारे होने से मेरा होना सार्थक होता।

जब तुम शाला छोड़ जाते तो साथ में छोड़ जाते तूम्हारी हंसी, ऊर्जावान चेहरे, शक्तिसम्पन्न शरीर का अहसास, जीवटता, जुझारूपन और उत्तरोत्तर उन्नति की अभिलाषा। यह सब मुझे जीवंत बनाए रखते, शाला को शाला बनाए रखते। तुम्हारे बिना न मैं शिक्षक रह पाता, न ही शाला शाला रह पाती।

*मेरे बच्चों, *तम्हारी* सफलता उत्तरोत्तर उन्नति, विकास और सम्मानजनक मुकाम हासिल करने में ही मेरा सच्चा सम्मान और संतोष निहित होता।* इसमें तुम्हारा शिष्यत्व और मेरा शिक्षकत्व दोनों ही सार्थक हो उठते। और तुम इसे पूरा करने हेतु पूरे प्राणपन से जुट जाते।
सस्नेह।

शुभकामनाओं सहित,

#गोपाल कौशल

परिचय : गोपाल कौशल नागदा जिला धार (मध्यप्रदेश) में रहते हैं और रोज एक नई कविता लिखने की आदत बना रखी है।

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