
एक आदमी ने
पत्थर विजित किया
वो उसे उठाकर
घर ले आया
दिन रात उसकी
पहरेदारी करने लगा
वो आजाद होने का
गुमान करता रहा
मगर
उन्ही ढकोसलो मे
जीते जीते
उसने
जिन्दगी गुजार दी
फिर उसने
उसी पत्थर से बंधकर
समंदर मे तैरने की सोची
वो वहीं
डूब गया
उसी पत्थर के साथ
जिसे वो
विजय का प्रतीक समझता
दरअसल
वो पत्थर
जिसकी वो गुलामी
जिन्दगी भर करता रहा
उसी के साथ
मृत्यु के गाल में समाया
वो संकेत था
उसकी गुलामी का
जिसे वो
अपनी विजय का
प्रतीक समझता रहा।
शंकर सिंह परगाई
श्रीनगर गढ़वाल(उत्तराखण्ड)

