ऐ नौकरी मेरी नौकरी
तू है कहां तू है किधर
तुझे ढूंढती मेरी नजर।।
जो मिल गई तो संवर गया,
गर न मिली तो बिखर गया।
तू है तो सब कुछ पास है,
तू जो गई तो सब गया।
बिन नौकरी कीमत नही ,
कोई कितना भी पढ़ लिख गया।
तुझ बिन न बिछती है दरी,
तुझ बिन न मिलती सुन्दरी।
ऐ नौकरी मेरी नौकरी
तू है कहां तू है किधर
तुझे ढूंढती मेरी नजर।।
नौकर ही बनना शान है,
और नौकरी में मान है।
तू जो नही कुछ भी नही,
तू सांस है तू जान है।
अपमान सहता बिन तेरे,
सम्मान की तू खान है।
आश्चर्य विस्मित मन हुआ,
तेरी देखकर कारीगरी।
ऐ नौकरी मेरी नौकरी
तू है कहां तू है किधर
तुझे ढूंढती मेरी नजर।।
तेरे बिना कैसे रहूं,
दुख दर्द मैं कैसे सहूं।
तबियत न मां की ठीक है,
बोलें पिता लाओ बहू।
सुख चैन न दे पाउंगा,
अब उनसे मैं कैसे कहूं।
जेबें हैं खाली खुशियां जाली
फिर भी बने हैं चौधरी।
ऐ नौकरी मेरी नौकरी
तू है कहां तू है किधर
तुझे ढूंढती मेरी नजर।।
तेरे बिना न रिश्ता है ,
और न ही कोई नाता है।
हाथ तो हैं मिलाते पर,
ना साथ कोई निभाता है।
सारे गणित ही भूलें अब,
कुछ गिनना भी ना आता है।
बस तेरे पीछे घूमते ,
ले करके सारी ही डिग्री।
ऐ नौकरी मेरी नौकरी
तू है कहां तू है किधर
तुझे ढूंढती मेरी नजर।।
जो नौकरी गले लग गई,
सब बाबू भइया कहते हैं।
नजरें जो फेरा करते थे,
अब साथ वो ही रहते हैं।
‘ए्हसास’ डिगरीधारी का,
जो डांट गाली सहते हैं।
तू जो मिला इन्सान से ,
लग गई जैसे लाटरी।
ऐ नौकरी मेरी नौकरी
तू है कहां तू है किधर
तुझे ढूंढती मेरी नजर।।
#अजय एहसास
परिचय : देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के सुलेमपुर परसावां (जिला आम्बेडकर नगर) में अजय एहसास रहते हैं। आपका कार्यस्थल आम्बेडकर नगर ही है। निजी विद्यालय में शिक्षण कार्य के साथ हिन्दी भाषा के विकास एवं हिन्दी साहित्य के प्रति आप समर्पित हैं।
Thu May 2 , 2019
वो मेरे घर पे आते नहीं अपने घर पे बुलाते नहीं परीशां खूब है वो भी वजह क्या है बताते नहीं बातें हुई ज़माने भर की पर निगाहों को उठाते नहीं कैसे होगी मंज़िल आसान हया का पर्दा भी गिराते नहीं कैसे मालूम होगी रज़ामंदी इश्क़ अपना तो जताते नहीं […]