जीवन की संध्या बेला में जब तन के साथ मन भी जर्जर होने लगता है तब तक अपनी संतति भी आजीविका के लिए मजबूर हो अपनी जड़ों से दूर जा बैठती हैं। जिन बच्चों की किलकारियों और चुहलबाजी से घर की ईंटे भी
ठहाका मारा करतीं थी आज वहां घुप्प सन्नाटा पसरा हुआ है। गहरी नीरवता को तोड़ती महरी की आवाज़ या यदा कदा पति-पत्नी के संवाद जिन्दा रहने का सबूत दे दिया करता हैं ।
बुजुर्ग दंपत्ति एक दूसरे की भावनात्मक जरूरतें पूरी करते मानो जीवन दीप के बुझने का इन्तजार कर रहे हों।
बदलते मौसम के कुप्रभाव ने बुढ़ी हड्डी को अपने चपेट में लेने में देरी नहीं की। पति की सेवा करती जीर्ण शीर्ण काया भी अंततः मौसम की मार से स्वंय को बचा न पाई।
दो बक्त की रोटी तो काम वाली बना जाती पर बीमारी से
लड़ने का हौसला वे कहाँ से पाते जो अपने सगे ही दे सकते।
मन बहलाने के लिए बागीचे में झूला झूलते अतीत के सुखद दुखद पलों को जीते वर्तमान से कोसों दूर जा रहे थे कि कौवे की कर्कश बोली ने ध्यान भंग कर दिया।
‘अरे ओ मुँहजली क्यों शोर कर रही हो? किसके आने का बाट जोहने कहती हो ? भला सूखे वृक्ष पर किसी ने नीड़ बनाया है।” साड़ी के आँचल से वृद्धा चूपके से बह आए
आँसू को पोंछ लिया कहीं पति ने देख लिया तो फिर सारा दिन उदासी से घिरे रहेंगे ।
मन बदलने के लिए सरसरी निगाहों से बागीचे का मुआयना करने लगी,बेतरतीब तरीके से फैले पौधे को बारिश की बूंदो ने जिन्दा तो रखा था पर देखभाल के अभाव में चमन उजाड़ प्रतीत हो रहा था।
अचानक हाथ में रखी मोबाइल घनघना उठी। बेटे ने, उन्ही के शहर में पदस्थापन की खबर दे दूनिया की सारी खुशियाँ उनके दामन में डाल दिया।होठों पर मधुर स्मित खेल गई ,जीने का हौसला एकाएक बढ़ गया था ,उनलोगों का। दूर किसी पेड़ के सूखे डाल पर हरे हरे कोपल निकल रहे थे।कौवे के कांव कांव की आवाज मधुर संगीत सा मन को उत्साहित कर रहा था।
फड़फड़ाती लौ के बुझने से पहले ही दीप में घी डाल दिया गया।
#किरण बरनवाल
जमशेदपुर