दीवाली के अगले दिन दीवाली

niraj tyagi
हर साल की तरह दिवाली का त्यौहार आने पर राज और पिंकी बहुत खुश थे।इस त्यौहार पर चारो तरफ होने वाली रोशनी और पटाखों की धूम दोनों बच्चों के मन को बहुत खुशी देती थी,लेकिन इनकी दिवाली उस दिन नही होती जिस दिन दीवाली होती है, दिवाली के अगले दिन शुरू होती थी।
 रात को जब सारे बच्चे पटाखे चलाते थे,ये दोनों बच्चे उन्हें देखकर बहुत खुश होते थे और उन पटाखों के शौर से खुशी से दोनों बच्चे बहुत खूब नाचते गाते थे।दीवाली के त्यौहार पर जब सब बच्चे पटाखे छुड़ाते तब अगर कुछ पटाखे नही चलते थे।वो दोनों बच्चे उन्हें उठा कर एकत्रित कर लेते थे।
उनके पिता बहुत ही गरीब व्यक्ति थे और अपने बच्चो की सारी इच्छाएं पूरी नही कर पाते थे। इनके पिता की आमदनी इतनी अच्छी नहीं थी क्योंकि वो एक धोबी का काम करते थे और इस महंगाई के दौर में बड़ी मुश्किल से अपने बच्चो का लालन पालन कर रहे थे।
दोनों बच्चो को रात भर दीवाली पर खुशी के मारे नींद ही नही आती थी।इसलिए नही कि उन्हें भी पटाखे छुड़ाने होते थे बल्कि इसलिए की अगले दिन सुबह जल्दी उठकर वो आसपास के सारे एरिया के कूड़े के ढेर से पटाखों को एकत्रित करते थे जो सही होते थे जिससे वो इन्हें दीवाली पर ना सही पर उसके अगले दिन उन्हें छुड़ा सके। कितना दुखद है पर इसी तरह दीवाली के अगले दिन वो दीवाली मनाते थे।
#नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

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