तुम हो मेरी मांग का सिन्दुर
तुम हो मेरे सोलह श्रृंगार
सदा सुहागन रहुँ मैं
देना आर्शीवाद हर बार
चुड़ी खनके हाथो मे खन-खन
पैरो मे हो पायल की झंकार
माथे पर हो बिन्दियाँ सुहाग की
गले मे हो मोतियों का हार
आँखों मे हो कजरा और
होठो पर हो लाली
बाजु मे हो बाजुबंध और
कानो मे हो बाली
नाक मे पहनु नथनिया
मांग पर हो मेरी टिका
पहनु मैं पैरो मे बिछिया
रंग ना हो उसका फिका
चुनरी ओढ़ सुहागन की
मिले पति का प्यार
मेहंदी रचे हाथों मे मेरे
लहगा पहनु घेरदार
कमर पर है कंदोरा
जुड़े मे फुलो का गजरा
पैरो मे हो पैवरू
खुश्बु से महके घर द्वार
नयनो मेरे बसकर रहना
मांग मे मेरी सजकर रहना
जब तक रहुँ सुहागन रहुँ
सुखी रहे मेरा घर संसार
जब तक रहुँ सुहागन रहुँ
कभी न छुटे यह सोलह श्रृंगार
#कविता-धनराज वाणी
परिचय-
1.श्रीमती कविता वाणी
प्राचार्य कन्या शिक्षा परिसर
जोबट विकास खण्ड
जोबट जिला-अलीराजपुर
(मध्यप्रदेश)
(मूल निवास जोबट)
जन्म स्थान- जोबट
पति का नाम -धनराज वाणी
शिक्षक व कवि (वीर रस)
2.शिक्षा-एम.ए.बी.एड.
(समाजशास्त्र/अंग्रेजी)
3.रुचि-साहित्य व रचनाकार
गीत व कविताओं की रचना
महिला सशक्तिकरण पर
विशेष….
4.उपलब्धियां-आकाशवाणी
इंदौर से अनेको बार काव्य
पाठ किया व साहित्यिक
मंचो का संचालन भी
किया
5.बचपन से साहित्य व
लेखन में रुचि
Fri Oct 26 , 2018
भरती हैं सिंदूर की लंबी मांग जीवन साथी ही उसका भाग । करें वटसावित्री , करवा चौथ व्रत ताकि दीर्घायु रहें सुहाग ।। जीवन महकता रहें दिलबाग खुशियों के संग हो हर राग । वह चलती हर पथ संग-संग समझकर वह अपना सुभाग ।। सतीरुप में ग्रहण करती आग सुहाग […]