समय के साथ-साथ जैसे परिवार के मुखिया का स्वरूप बदलता रहता है, ठीक उसी प्रकार से आज हिंदी का स्वरूप भी बदला हुआ है । हिंदी आज के परिवेश में बुजुर्गियत की सीमा रेखा को पार करने के कगार पर है । शायद इसलिए हमने हिंदी को कुर्सी पर बिठा घर के एक कोने में डाल रखा है ।
ऐसा नहीं है कि हम अनदेखा कर रहे हैं ।
नहीं-नहीं बिल्कुल भी नहीं समय-समय पर उसे देखते रहते हैं । जब भी वह बेहोश होने लगती है हम ,,,,, *हिंदी हमारी मातृभाषा है, हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान “* जैसे नारों के छींटे उसके मुंह पर मार उसे होश में ले आते हैं ।
हम पूर्ण रूप से उसे मृत भी नहीं होने दे सकते ,ठीक वैसे ही जैसे पेंशनधारी बुजुर्गों को जबरदस्ती कुछ और अधिक सालों तक जीवित रखने का निर्मूल प्रयास करते हैं । आखिर कब तक हम यूं हिंदी को घसीटते रहेंगे ,अपमानित करते रहेंगे।
हम ऐसे भारतीय हैं जिन्हें हिंदुस्तानी होने पर तो गर्व महसूस होता , परंतु हिंदी बोलने पर शर्म आती है । जब तक हमें हिंदी बोलने पर गर्व अनुभव नहीं होगा हिंदी अपनी तरुणाई को नहीं पा सकेगी । कुछ एक रोज हिंदी प्रेम का नारा देने से ,हिंदी दिवस मना लेने से ही हिंदी के प्रति हमारे कर्तव्य समाप्त नहीं हो जाते। जरूरत है हमें रोज ही उसकी देखभाल करने की ,उसे दुलारने की, खुद में आत्मसात करने की तभी हम उसे वह अधिकार ,वह सम्मान दे पाएंगे जिसकी वह हकदार है ।
*स्वराक्षी स्वरा*
*खगड़िया बिहार*