गौरी जोहवे वाट,
फागुन को ठाट..
हाट रंग-पिचकारी को,
छुप गयो जाने कहाँ।
देखें हम यहाँ,
दो महतारी को।
डारूँ उनपे रंग,
करूं मैं तंग।
और वो झुँझलाए,
मन में मेरे बात..
पिचकारी साथ
शायद ही बच पाए।
गालन मलै गुलाल,
बिगाड़ें हाल।
आज दिन होरी को,
करें हमें परेशान।
बाप बलवान,
बदला लें चोरी को।
एक लगाए बात,
करे एक घात।
ब्रज की गौरी रे,
भोरे मेरे श्याम।
ललित ललाम
खेलें सब होरी रे…।
#विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’


