गाय

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‘माँ हमारी गाय बहुत बीमार इसे डॉक्टर के पास क्यों नही ले जाते?’ नन्ही जूही ने अपनी माँ से कहा। माँ ने दर्द को छिपाते हुए कहा ‘बेटी तेरे बाबा भी अपनी पहली बीमार गाय को डॉक्टर के लेकर गए थे उनकी लाश ही आई थी ऐसें में कौन अपनी जान को जोखिम में डालेगा। मर जाने दो इसे यहीँ नही तो हमारी जान चली जायेगी।’  माँ ने तड़पती गाय की तरफ देखा उसके दिल मे हुक सी उठ रही थी वो इस गाय को अपनी जान से ज्यादा प्यार करती थी लेकिन शहर के हालात ऐसे थे कि वो गाय को डॉक्टर के पास लेकर निकले नही की भीड़ उन्हें नोंच खायेगी।
गाय तड़प रही थी और माँ बेटी भी। लेकिन वो चाह कर भी कुछ नही कर पा रहे थे ।
थोड़ी देर में गाय शांत हो गई।
घर मे भी शांति छा गई लेकिन उसकी लाश को लेकर जाने का फिर यक्ष प्रश्न खड़ा था।
 माँ बेटी फिर रोने लगी। गाय की मौत के लिये नही अपने जीवन के लिए। वो दोनों सोच रही थी उन्होंने गाय पाली इसमे उनका क्या दोष?
लेकिन कोई जवाब नही था । प्रश्न था की ‘अब क्या होगा’ क्योंकि गाय की लाश देख भीड़ उनके साथ क्या करेगी पता नही था लेकिन उनके पास कोई जवाब अब भी नही था।
उनकी आंखों में ख़ौफ़ था और उन्ही आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे।
राजेश मेहरा
नई दिल्ली।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

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