पशुओं की जिंदगी जी रहे चाय मजदूर

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vaidik
असम के चाय बागान में मजदूरों के साथ जो अत्याचार हो रहा है, उसे कौन बंद करवाएगा ? जब पहली बार मैं असम के चाय बागान में गया और मजदूरों के साथ उठा-बैठा तो मुझे मालूम पड़ा कि उनकी हालत लगभग वही है, जो जानवरों की होती है। उनके कपड़े, उनका भोजन, उनके झोपड़े, उनकी सेहत और उनके बच्चों की शिक्षा के बारे में ज्यों-ज्यों पूछता हूं, मेरे रोंगटे खड़े होते जाते हैं। जिस चाय-बाग के मालिक के यहां मैं ठहरा था, जब मैंने उनसे बात की तो वे कहने लगे कि ये लोग खुशी-खुशी काम करते हैं। इनकी जरुरतें बहुत कम हैं। ये ज्यादा मजदूरी के लिए आग्रह भी नहीं करते लेकिन वे क्या खाक आग्रह करेंगे ? चाय-मजदूरों के दो बड़े संगठन हैं, असम में। उनके दो-दो तीन-तीन लाख सदस्य हैं लेकिन वे भी असहाय हैं, निरुपाय हैं। आज भी असम के चाय-मजदूरों को दस घंटे रोज काम करने के बावजूद सिर्फ 137 रु. रोज मिलते हैं। यदि वे रोज चाय की 25 किलो पत्तियां तोड़कर जमा न कर सकें तो उनके ये 137 रु. भी खटाई में पड़ जाते हैं। इसमें से भी उनकी भविष्य निधि के रुप में कटते हैं, जब पत्तियां कम टूटती हैं तो पैसे कम मिलते हैं और कभी वे बीमार पड़ जाते हैं तो अपनी खर्चे से उन्हें इलाज करवाना पड़ता है। इन बागान में अभी आठ लाख लोग काम करते हैं, जिनमें से 4 लाख 56 हजार महिलाएं हैं। सच्चाई तो यह है कि इन चाय मजदूरों को 100 रु. रोज भी नहीं मिलते जबकि चाय का कारोबार 5 हजार करोड़ रु. से भी ज्यादा का है। इस वर्ष देश में 132 करोड़ किलो चाय पैदा हुई। सिर्फ असम की चाय दुनिया की 22 प्रतिशत जरुरत पूरी करती है। इन चाय बागान में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, प. बंगाल तथा अन्य प्रांतों से आए मजदूरों की कई पीढ़ियां यहीं खप जाती हैं। अपने मूल स्थान से उनका संपर्क लगभग टूट ही जाता है। उनके पास इतने पैसे ही नहीं होते कि वे अपने गांव आ-जा सकें। उनके बच्चे भी यहीं मजदूरी करने के लिए मजबूर होते हैं। उनके माता-पिता उन्हें पैसों के अभाव में पढ़ा-लिखा नहीं पाते। पढ़ाना तो दूर की बात है, उनके मनपसंद खाना भी नहीं खिला सकते। उनके छोटे-छोटे बच्चे खिलौनों को तरस जाते हैं। वे नंगे पांव ही घूमते रहते है, चड्डी-बनियान पहने हुए। वे अक्सर जहरीले जानवरों और सांपों के शिकार भी हो जाते हैं। चाय के बड़े-बड़े खेतों के पास बने उनके झोपड़े उनको सामान्य समाज से अलग-थलग जीवन जीने के लिए मजबूर कर देते हैं। पता नहीं क्यों, केंद्र और प्रांत की सरकारें सीधा हस्तक्षेप क्यों नहीं करतीं ? यदि उनकी मजदूरी दुगुनी भी कर दी जाए तो क्या होगा ?  चायवालों का मुनाफा थोड़ा-थोड़ा कम हो जाएगा लेकिन करोड़ों लोगों को रोज सुबह-सुबह चाय का आनंद प्रदान करनेवाले ये लाखों मजदूर सभ्य मनुष्यों का जीवन जी सकेंगे।
       #डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।