
जिस शाख़ से हैं हम
आकाश की ऊँचाई पर
उड़नें की ख़ातिर
उस शाख़ से जुदा होते
लोगों को देखा है
अपनों से जुदा हुए
लोगों की याद में
इस शाख़ को
रोते देखा है
फिर भी फ़क़त मैं जुडा हूँ
उस शाख़ से
बाकी,
उस शाख़ से जुदा होते
लोगों को देखा है
#डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
Wed Jul 11 , 2018
कटी जो तुम बिन एक उमर थी। बीती जो तुम संग,वो थी जिंदगी। किया जो तूने,शायद इशक था , की जो मैनें,वो तो थी बंदगी। तूने जो की,वो थी दिल्लगी निभाई पर मैने,दिल की लगी। यकीन के बदले में मिली शर्मिदगी। कर गया तू साथ मेरे दरिंदगी। बेवफाओ की ,की […]