जानती हूं मैं नारी हूं,
आदेश था बस सुन सकती।
बरसों से यूं सुनती रही,
अब बहुत कुछ कह सकती।
चूंकि आज सतयुग है नहीं,
मैं सीता नहीं बन सकती।
चूंकि आज द्वापर भी नहीं,
मैं राधा नहीं बन सकती।
कल्पना चावला रूप धर,
भेद अंतरिक्ष जा सकती।
फाइटर-पायलेट बनकर,
लोहा शत्रु से ले सकती।
मैं अधम नर अपराधी को,
संगीन सज़ा सुना सकती।
कला-साहित्य के क्षेत्र में,
नर को पानी पिला सकती।
स्वार्थवश अराजक बन के,
कोहराम तक मचा सकती।
व्यवस्था भंग होने पर कभी,
नियंत्रण-कदम उठा सकती।
नर वर्षों से अभिमानी था,
नारी क्योंं नहीं हो सकती ?
कलयुग चला अंत की ओर,
नारी नर को हरा सकती।
अधिकार-वजन को तौलती,
तराज़ू ही कुछ कह सकती।
नर-नारी का खेल अजीब,
नियति ही स्वयं बता सकती।
#डॉ.चंद्रा सायता
परिचय: मध्यप्रदेश के जिला इंदौर से ही डॉ.चंद्रा सायता का रिश्ता है। करीब ७० वर्षीय डॉ.सायता का जन्मस्थान-सख्खर(वर्तमान पाकिस्तान) है। तत्कालिक राज्य सिंध की चंद्रा जी की शिक्षा एम.ए.(समाजशास्त्र,हिन्दी साहित्य,अंग्रेजी साहित्य) और पी-एचडी. सहित एलएलबी भी है। आप केन्द्र सरकार में अधिकारी रहकर
जुलाई २००७ में सेवानिवृत्त हुई हैं। वर्तमान में अपना व्यक्तिगत कार्य है। लेखन से आपका गहरा जुड़ाव है और कविता,लघुकथा,व्यंग्य, आलेख आदि लिखती हैं। हिन्दी में ३ काव्य संग्रह, सिंधी में ३,हिन्दी में २ लघुकथा संग्रह का प्रकाशन एवं १ का सिंधी अनुवाद भी आपके नाम है। ऐसे ही संकलन ७ हैं। सम्मान के तौर पर भारतीय अनुवाद परिषद से, पी-एचडी. शोध पर तथा कई साहित्यिक संस्थाओं से भी पुरस्कृत हुई हैं। २०१७ में मुरादाबाद (उ.प्र.) से स्मृति सम्मान भी प्राप्त किया है। अन्य उपलब्धि में नृत्य कत्थक (स्नातक), संगीत(३ वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण),सेवा में रहते हुए अपने कार्य के अतिरिक्त प्रचार-प्रसार कार्य तथा महिला शोषण प्रतिरोधक समिति की प्रमुख भी वर्षों तक रही हैं। अब तक करीब ३ हजार सभा का संचालन करने के लिए प्रशस्ति -पत्र तथा सम्मान पा चुकी हैं। लेखन कार्य का उद्देश्य मूलतः खुद को लेखन का बुखार होना है।
Mon Feb 5 , 2018
मैं तुझ आत्मा का कौन हूँ! पल-पल का साथी, तेरा हर व्यवहार हूँ मैं। तेरे सब रिश्ते-नातों का सात्विक सार हूँ मैं, तुझमें ही रचा-बसा,घुला-मिला तुझसे भी पार हूँ मैं। पल-पल का साथी, तेरा हर व्यवहार हूँ मैं॥ तुझसे भरा हुआ,तुझसे भी रिक्त, तेरे ममत्व से स्वयं को कर अभिषिक्त […]