मैं औरत हूँ,
एक नहीं,दो घर बनाती हूँ।
एक घर में बेटी बनकर,
मान बढ़ाती हूँ।
दूसरे घर में बहू बनकर,
कुलदीपक जलाती हूँ।
मैं औरत हूँ…
एक बार नहीं,
दो बार जन्म लेती हूँ।
एक
अपने माँ-बाबुल के दामन,
दूसरा
सास-ससुर के आंचल।
एक रिश्ते निभाने हमें नही आते हैं,
हम हजारों रिश्ते निभा जाते हैं।
किसी की मौसी,
किसी की बुआ
और किसी की भाभी,
चाची हूँ।
बच्चों को लोरी सुनाती
बूढ़ी माँ-दादी हूँ।
मैं औरत हूँ…
देशहित में,
फिरंगियों से लड़ जाने वाली
‘झाँसी’ की रानी हूँ।
मेहनतकश मजदूरों का
साथ देने वाली हूँ।
विष को अमृत समझ
पी जाने वाली,
कृष्ण की ‘मीरा’ हूँ।
ज्ञान का वरदान देने वाली,
सरस्वती
और समाज की
शोहरत हूँ।
मैं,
औरत हूँ।
सो गई मैं,
पर दुनिया को जगाने वाली
दामिनी हूँ।
नियमों को तोड़,
जग में प्रेम फैलाने वाली
कृष्णा की राधारानी हूँ।
पति की लम्बी
आयु के लिए,
सावित्री बन
यमराज से लड़ने वाली हूँ।
पाप करने वाले,
मेरे जल को छूते ही
पाप मुक्त हो जाते हैं,
वही गंगा हूँ मैं।
दुष्टों की विनाशक,
काली माँ हूँ मैं।
दुनिया का सृजन आधार,
झूठ अनेक में
एक सच हूँ…,
मैं औरत हूँ॥
#सुमिधा सिदार ‘हेम’
परिचय : सुमिधा सिदार का साहित्यिक उपनाम-हेम(पति का नाम और वही आदर्श)है। १३ सितम्बर १९९० को जन्मीं सुमिधा सिदार का जन्म स्थान-ग्राम कुण्डापाली है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य में महासमुंद जिले के ग्राम-सरकण्डा में रहती हैं। आपकी शिक्षा-बी.ए. और कार्यक्षेत्र-सरकण्डा ही है।
सामाजिक क्षेत्र में आप लोगों को बेटी की महत्ता बताने के साथ ही हूँ तनाव से राहत के लिए हँसाने की कोशिश करती हैं। लेखन विधा-कविता,कहानी,एकांकी, हाइकु,तांका एवं शायरी है। आपकी नजर में मेरी लिखी रचना कोई दूसरा पढ़ता है,वही सम्मान है। आप ब्लॉग पर भी लिखती हैं। आपके अनुसार लेखन का उद्देश्य-समाज की औरतों के प्रति है, क्योंकि,गोंडवाना समाज को निखारना है,ताकि महिला वर्ग घर,गली,गाँव से बाहर निकलकर समाज के बारे में सोंचे।
Tue Jan 16 , 2018
सुना विश्व को निज विचार, बदली उसके पथ की धारl जहां विश्व हो भ्रमित खड़ा था, गंतव्य दिशा के बंद पटों को […]