राजपथों ने दिया भरोसा तोड़ दिया है,
पगडंडी लाचार करे भी तो आखिर क्या।
ऊजड़ होते गाँव सूखते खलिहानों में,
जीवन की उम्मीद ढूँढती बूढ़ी नज़रें
कभी मना करती थी उनके गाँवों में जो,
दीवाली वो ईद ढूँढती बूढ़ी नज़रें
पास नहीं बुधिया चाचा के रुपया-पैसा,
ऊपर से बीमार,करे भी तो आखिर क्या…।
उजड़े आँगन टूटे छप्पर टूटे सपने,
कुछ यादें है शेष निशानी बाकी है कुछ
रो-रोकर पथराए दर्द भरे नयनों में,
उम्मीदों का अब भी पानी बाकी है कुछ
बीत रहा है ग्रामीणों का जीवन यूँ ही,
विपदा में लाचार करे भी तो आखिर क्या…।
साथ भोर के नित बढ़ते इन अंधियारों को,
चकाचौंध में रहने वाले क्या समझेंगे
इन अधरों की बूँद-बूँद पानी की तृष्णा,
सुख सागर में बहने वाले क्या समझेंगे
मौन गाँव अपने अधरों को मुखरित करके,
दे उनको विस्तार करे भी तो आखिर क्या…।
जैसे कदली की परतों में केवल परतें,
वैसे सत्ता की बातों में केवल बातें
क्यूँ कर देंगे अंधियारे दिन उन्हें दिखाई,
उनकी चकाचौंध है मावस की भी रातें
भ्रष्ट तंत्र अंधा बहरा है कौन सुनेगा,
करके दीन पुकार करे भी तो आखिर क्या…॥
#सतीश बंसल
परिचय : सतीश बंसल देहरादून (उत्तराखंड) से हैं। आपकी जन्म तिथि २ सितम्बर १९६८ है।प्रकाशित पुस्तकों में ‘गुनगुनाने लगीं खामोशियाँ (कविता संग्रह)’,’कवि नहीं हूँ मैं(क.सं.)’,’चलो गुनगुनाएं (गीत संग्रह)’ तथा ‘संस्कार के दीप( दोहा संग्रह)’आदि हैं। विभिन्न विधाओं में ७ पुस्तकें प्रकाशन प्रक्रिया में हैं। आपको साहित्य सागर सम्मान २०१६ सहारनपुर तथा रचनाकार सम्मान २०१५ आदि मिले हैं। देहरादून के पंडितवाडी में रहने वाले श्री बंसल की शिक्षा स्नातक है। निजी संस्थान में आप प्रबंधक के रुप में कार्यरत हैं।