मन के तार को जब छूते हैं
प्रीत मीत के स्वर लहरी।
या कि विकल समाधान को
कोई पीड़ा होती है गहरी॥
वेगवती नदी बरसाती-सी वह
अल्हड़ रुकती नहीं कहीं।
ऐसी उर की उद्दाम तरलता
होता सच्चा संगीत वहीं॥
भर जाता आनन्द असीम
रोम-रोम पुलकित होते।
मधु मिश्रित मलयानिल-सा
मधुर झकोरे हैं लगते॥
अग जग सारा हर्षित लगता
मन की हरित हरियाली से।
कानन के भी कुसुम महकते
विहग चहकते हर डाली के॥
किन्तु पीड़ा का कीट कुतरता
मृदृ मराल मन-मानस को।
तब दूज का चन्दा लगता है
उगा गलत अमावस को॥
स्वर साधक के सुर ताल की
बजती है जब अन्तर वीणा।
मन भावों के अनुरूप निकलते
मिलन गीत या कि पीड़ा॥
सप्त सुरों की गहराई में खोजा
पूर्वजों ने स्वर्णिम जीवन।
उत्सव व्रत त्योहार अधूरे,
बिन संगीत गीत गायन॥
#विजयकान्त द्विवेदी
परिचय : विजयकान्त द्विवेदी की जन्मतिथि ३१ मई १९५५ और जन्मस्थली बापू की कर्मभूमि चम्पारण (बिहार) है। मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के विजयकान्त जी की प्रारंभिक शिक्षा रामनगर(पश्चिम चम्पारण) में हुई है। तत्पश्चात स्नातक (बीए)बिहार विश्वविद्यालय से और हिन्दी साहित्य में एमए राजस्थान विवि से सेवा के दौरान ही किया। भारतीय वायुसेना से (एसएनसीओ) सेवानिवृत्ति के बाद नई मुम्बई में आपका स्थाई निवास है। किशोरावस्था से ही कविता रचना में अभिरुचि रही है। चम्पारण में तथा महाविद्यालयीन पत्रिका सहित अन्य पत्रिका में तब से ही रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। काव्य संग्रह ‘नए-पुराने राग’ दिल्ली से १९८४ में प्रकाशित हुआ है। राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष लगाव और संप्रति से स्वतंत्र लेखन है।
Wed Dec 27 , 2017
देखते हो आप हर जगह एक प्रतिस्पर्धा, हर कोई आगे निकलना आगे बढ़ना चाहता है, इसके लिए दिन-रात सुबह-शाम दौड़ रहा, लगातार चल रहा एक अंधी दौड़, जिसमें शांति नहीं केवल होड़ है, जिसका न आदि न अंत है, निन्यानवें के फेर-सा क्या चाहता आदमी धन जोड़ना नाम कमाना दहशत […]