स्वतंत्रता बनाम पाश्चात्यता

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pukharaj
अन्तर्जातीय विवाहों को समय पर रोक दिया होता,
संस्कारों का हनन हमने यूं मूक सहा नहीं होता।
तो
स्वतंत्रता के नाम पर उच्छश्रंखलता नहीं बढ़ी होती,
भव्यता के प्रदर्शन में अश्लीलता नहीं पनपी होती।
वक्त रहते सम्भलना हमको यदि आ जाता,
‘लव जिहाद’ का दंश भारत में नहीं पनप पाता।
(ऐसा क्यों होता है)
नई परम्पराएं विकसित होतीं सदा कुलीन घरों में,
और पसरती जाती वे समाज,गांव,नगरों में।
जहां रिवाजों को अंधविश्वास बताया जाता है,
भोंडे आडम्बर (पाश्चत्य प्रदर्शन) को आधुनिक दर्शाया जाता है।
जहां रूढ़िवाद कह,’संस्कारों’ की बलि चढ़ाई जाती है,
याद रहे,कालांतर में वो सभ्यता रोती है, पछताती है॥
#पुखराज छाजेड़
परिचय : जयपुर के निवासी पुखराज छाजेड़ करीब 10 वर्ष से लगातार लेखन में सक्रिय हैं। जयपुर(राजस्थान) में व्यवसायी होने के बाद भी बतौर रचनाकार आप सतत सक्रिय हैं।

matruadmin

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One thought on “स्वतंत्रता बनाम पाश्चात्यता

  1. आदम को फिर से आदम होना चाहिए…
    हव्वा अपनी ढूंढ के लाना मक़सद होना चाहिए…,

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