चंचलता या
मुस्कान मेरी,
मेरी आभा ओ
शान मेरी,
सब कुछ
जो है
सरलता मेरी,
मेरा मुझमें जो भी है
मुझसा ही तो है,
मैं बदलूं खुद को
क्यों
किसके लिए,
मेरा मुझमें
जो भी है
मुझसा ही तो है,
चाहे कोई मुझे
या न चाहे
मैं खुद को ही चाहूं,
क्योंकि
मेरा मुझमें जो भी है,
मुझसा ही तो है॥
#विजयलक्ष्मी जांगिड़
परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़ जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।
Wed Dec 6 , 2017
कुछ प्रीत जगानी थी मुझको, कुछ रीत निभानी थी मुझको। कुछ ऐसे गीत सुनाने थे, जो महफिल को भी भाने थे॥ कुछ सूरज की अरुणाई के, कुछ तरुणों की तरुणाई के। कुछ देश धरा की माटी के, कुछ भारत की परिपाटी के। कुछ ऐसे नगमे गाने थे’ जो महफिल को […]