रिश्ता भी मेरा था
शर्तें भी मेरी थीं,
रूठना भी मेरा था
बस एक वो ही न मेरी थी।
कसमें भी मेरी थीं
वादे भी मेरे थे,
हाँ और न की फितरत भी मेरी थी
बस उसके बहते आँसू न मेरे थे।
इन्तजार भी मेरा था
साथ भी मेरा था,
दिलों पर राज भी मेरे थे
बस उसका रुठना ही न मेरा था।
उलझनें भी मेरी थीं
धड़कनें भी मेरी थीं,
प्रेम के एहसास भी मेरे थे
बस उसका खामोश होना ही न मेरा था।
कुछ शब्द मेरे भी थे
कुछ शब्द उसके भी थे,
अचानक उसका मैं नाराज नहीं हूँ
कह जाना,
बस यही बात उसकी न थी॥
#शालिनी साहू
परिचय : शालिनी साहू इस दुनिया में १५अगस्त १९९२ को आई हैं और उ.प्र. के ऊँचाहार(जिला रायबरेली)में रहती है। एमए(हिन्दी साहित्य और शिक्षाशास्त्र)के साथ ही नेट, बी.एड एवं शोध कार्य जारी है। बतौर शोधार्थी भी प्रकाशित साहित्य-‘उड़ना सिखा गया’,’तमाम यादें’आपकी उपलब्धि है। इंदिरा गांधी भाषा सम्मान आपको पुरस्कार मिला है तो,हिन्दी साहित्य में कानपुर विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान पाया है। आपको कविताएँ लिखना बहुत पसंद है।
Fri Dec 1 , 2017
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