नदिया का किनारा,साथ तुम्हारा साथी,
ह्रदय की गहराइयों की थाह लगाते साथी।
दूर क्षितिज भ्रुहरेखा-सी तरुमालिका दिखती,
विस्फारित नयनों में पूरा संसार समेटते साथी।
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देख लघुतरुणि असंख्य शब्द साथ चलते साथी,
विश्वास की लग्गी से गहराई की आँक लगाते साथी।
अदभुत है यह जीवन अदभुत सुहाना संसार साथी,
पुलिनों के जल से प्लावित झर-झर फेन उगलते साथी।
लघु तरुणि के जैसे ही इस संसार का गीत है साथी,
कभी इस ओर कभी उस छोर,फेर लगाना है साथी।
दो पुलिन छोरों में बँटा इस जीवन का क्रम साथी,
जन्म और मृत्यु शाश्वत, यही है मिलन संगम साथी॥
#शालिनी साहू
परिचय : शालिनी साहू इस दुनिया में १५अगस्त १९९२ को आई हैं और उ.प्र. के ऊँचाहार(जिला रायबरेली)में रहती है। एमए(हिन्दी साहित्य और शिक्षाशास्त्र)के साथ ही नेट, बी.एड एवं शोध कार्य जारी है। बतौर शोधार्थी भी प्रकाशित साहित्य-‘उड़ना सिखा गया’,’तमाम यादें’आपकी उपलब्धि है। इंदिरा गांधी भाषा सम्मान आपको पुरस्कार मिला है तो,हिन्दी साहित्य में कानपुर विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान पाया है। आपको कविताएँ लिखना बहुत पसंद है।