दुःख दर्द भी जिसका मजा
लूट रहे हैं,
वही आँसू आज मोती बनकर
छूट रहे हैं।
रिश्तों की खनखनाहट है
और टूटने का डर,
बचाने के लिए आँखों से आँसू
फूट रहे हैं।
होंठ पड़े हैं निःशब्द
पूछने के लिए क्या हुआ?
करीब जाने का रस्ता ढ़ूढ़ रहे हैं।
जीवनभर साथ निभाने वाले
आँसू,
आज अपनों से रस्ता पूछ रहे हैं।
कल तक थे जो गमे बेवफाई के दीवाने,
होकर ओझल,बनकर चोर
जाने-अनजाने राहगीरों को लूट रहे हैं॥
#अजय जयहरि
परिचय : अजय जयहरि का निवास कोटा स्थित रामगंज मंडी में है। पेशे से शिक्षक श्री जयहरि की जन्मतिथि १८ अगस्त १९८५ है। स्नात्कोत्तर तक शिक्षा हासिल की है। विधा-कविता,नाटक है,साथ ही मंच पर काव्य पाठ भी करते हैं। आपकी रचनाओं में ओज,हास्य रस और शैली छायावादी की झलक है। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन होता रहता है।
Tue Oct 31 , 2017
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