मेरी आँखों में बसे हो,
क्या कोई स्वप्न हो?
कौन हो तुम ?
मेरी श्वांसों में बसे हो,
क्या कोई तपन हो ?
कौन हो तुम ?
मुझमें समाए हो,
क्या कोई अगन हो ?
कौन हो तुम ?
मेरी ही छवि में छाए हो,
क्या कोई गगन हो ?
कौन हो तुम ?
हे प्रिय!
अभिन्न
विलग
तुम मैं
मैं तुम॥
#विजयलक्ष्मी जांगिड़
परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़ जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।
Fri Oct 27 , 2017
यूं बिगड़ी है दुनिया की चाल देखिए। क्यों इंसा यहाँ है बेहाल देखिए॥ इनके पापा बेचारे हैं जेल में पड़े। और बेटी है घूमे नेपाल देखिए॥ ये भगवा पहन के हैं करते कुकर्म। सारी काली है इनकी ये दाल देखिए॥ सफ़ेदी है बेटों के बालों चढ़ी। पिताजी कर काले हैं […]