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मेरी सहज अभिव्यक्ति को
माँ तुमने आधार दिया,
कल्पनाओ को भी सुंदर
तुमने एक संसार दिया।
अपनी गोदी में पाला मुझको,
चिंतन का संस्कार किया॥
चुका सकती हूं क्या ऋण
अब जीवन तुममे बहता है,
तुम में ही मां हिंदी मेरी,
अब मन रमता रहता है।
जब भी रोईं तुमने थामा,
गीतों का वरदान दिया
मुस्काई जब तुमने मुझमें,
कविता का सन्धान किया।
मेरी सहज…॥
देह दोहरी प्राण एक है,
अब अपना विधान एक है।
बोली बोले चाहे कोई,
पर भावों की तान एक है।
निर्झर,तुम स्वाति,सरिता हो,
प्यास को मेरी जान लिया।
कहीं गहरे बसती हो तुम्हीं,
अकिंचन का मान किया।
मेरी सहज…॥
#विजयलक्ष्मी जांगिड़
परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़ जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।
Sat Sep 16 , 2017
ऐ मेरे मालिक आता हूँ तुझसे मिलने, रोज तेरे मंदिर में कुछ दुख के बहाने-मुफ़लिसी के बहाने खुद को नई राह दिखने तो कभी तुझे जगाने, कभी खड़ा होता हूँ तेरे सामने रोता हूँ-दुआएं मांगता हूँ, जिसने जो कहा वही जतन करता हूँ, पर बेकार जाती हैं मेरी अर्ज़ी शायद […]