बैठ कभी भी फुर्सत में,
तुम सम्बन्धों की बात न करना।
सम्बन्धों के समीकरण तो बदल रहे हैं॥
ठंडे झोंकों से जब मैंने,
केवल तेरा नाम सुना था
सतरंगी तब सपनों का,
कोरा-सा इक जाल बना था
मोहनी बन्धन मुस्कानों की बात न करना।
मुस्कानों के अलंकरण तो बदल रहे हैं॥
हादसों से गुजर-गुजर,
मन जब भी लौटा
हर चेहरे को पहने,
पाया नया मुखौटा
आदमियों के चेहरों की तो बात न करना।
आदमियों के व्याकरण तो बदल रहे हैं॥
गगन चूमते भवनों ने,
गहराई झेली
नींव बनाते मजदूरों की,
हिम्मत खेली
नींव बने उन परिश्रमों की बात न करना
परिश्रमों के वशीकरण तो बदल रहे हैं॥
#सुशीला जोशी
परिचय: नगरीय पब्लिक स्कूल में प्रशासनिक नौकरी करने वाली सुशीला जोशी का जन्म १९४१ में हुआ है। हिन्दी-अंग्रेजी में एमए के साथ ही आपने बीएड भी किया है। आप संगीत प्रभाकर (गायन, तबला, सहित सितार व कथक( प्रयाग संगीत समिति-इलाहाबाद) में भी निपुण हैं। लेखन में आप सभी विधाओं में बचपन से आज तक सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों का प्रकाशन सहित अप्रकाशित साहित्य में १५ पांडुलिपियां तैयार हैं। अन्य पुरस्कारों के साथ आपको उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य संस्थान द्वारा ‘अज्ञेय’ पुरस्कार दिया गया है। आकाशवाणी (दिल्ली)से ध्वन्यात्मक नाटकों में ध्वनि प्रसारण और १९६९ तथा २०१० में नाटक में अभिनय,सितार व कथक की मंच प्रस्तुति दी है। अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षण और प्राचार्या भी रही हैं। आप मुज़फ्फरनगर में निवासी हैं|
Mon Sep 11 , 2017
रहे पल्लवित-पुष्पित यह, राष्ट्र जीवन की फुलवारी। विविध प्रान्त हैं सुमन मनोहर, खुशबू है सबकी न्यारी॥ भाषाएँ कई रम्य मनोरम, बोलियाँ कई यहाँ अनुपम। छह रितुएँ धर्म सात संग, है कहीं नहीं ऐसा दम-खम॥ फूटी सभ्यता किरण यहीं, जगे हम फिर जगत जागा। धर्म ज्ञान विज्ञान कला में, नित बढ़ते […]