बात लबों तक तो आएगी,
पर दबी रह जाएगी।
गर शब्दों के लिए
जगह न होगी महफिल में
कविताएँ शोक मनाएंगी,
ग़ज़ल दबी रह जाएगी।
आलम ये होगा दुनिया का
मन्दिर पडे़ होंगे खाली,
मूर्ति मिट्टी में दबी रह जाएगी
कोई नहीं जाएगा,
किसी मय्यत पर रोने
कांधा पाने की हसरत
दबी रह जाएगी।
तमन्ना थी कि बच्चे
होंगे बुढ़ापे का सहारा,
लात मारकर निकालेंगे घर से
अपनों की कमी रह जाएगी।
शर्म आएगी सभी को
वक्त की चादर पर गर्दिश की
धूल जमी रह जाएगी।
कुछ और कहने की
जुर्रत नहीं ‘जयहरि’
वक्त सभी का आएगा एक दिन,
साँसें थमी रह जाएगी॥
#अजय जयहरि
परिचय : अजय जयहरि का निवास कोटा स्थित रामगंज मंडी में है। पेशे से शिक्षक श्री जयहरि की जन्मतिथि १८ अगस्त १९८५ है। स्नात्कोत्तर तक शिक्षा हासिल की है। विधा-कविता,नाटक है,साथ ही मंच पर काव्य पाठ भी करते हैं। आपकी रचनाओं में ओज,हास्य रस और शैली छायावादी की झलक है। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन होता रहता है।
Thu Sep 7 , 2017
प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को, नमन मेरा प्रतिदिन अंतिम गुरूवर को॥ गुरू ज्ञान है गुरू मान है गुरूओं कारण ही पहचान है, दिया न होता ज्ञान गुरू ने ज्ञान रहित होता अन्ध मेरा मन, चक्षु रहित पशुवरत होता तन॥ प्रतिदिन नमन मेरा प्रथम गुरूवर को, नमन मेरा प्रतिदिन […]