सोचता हूँ अक्सर मैं यही कि,
तुम्हारा मिलना इत्तफ़ाक़ था
या फिर कोई हसीं ख़्वाब…
जो एक पल के लिए क़रीब आई
और फिर उम्र भर के लिए तुम
चली भी गई,प्यार की उमंग
दिल के कोने में जगाकर।
अब पूछता रहता हूँ मैं ख़ुद से,
कि अगर तुम्हें चले ही जाना था
मुझे तनहा छोड़कर तो फिर
तुम आई ही क्यों थी ज़िंदगी में
अरमानों के ख़्वाब सजाने को…
और जब मुझे इन सवालों का
नहीं मिलता कोई जवाब तो
रोने लगता हूँ दीवारों से लिपटकर।
इसी तरह ख़ुद को बहला लेता हूँ
दिन में अक्सर हँस-बोलकर मैं,
मगर रातों को मेरे कमरे में लगते हैं
यादों के मेले अब तो रोज़ ही…
रातें करवटें बदल-बदलकर बीतती हैं
और इंतज़ार में आँख़ें तुमसे पूछा करती हैं-
‘कितना अज़ीब संयोग है न!
कि क़िस्मत में न होकर भी
रहती हो सदा यादों में तुम!’
#विनोद सागर
परिचय: विनोद सागर लेखन क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। आपका जन्म ३ जनवरी १९८९ को जपला,पलामू में हुआ है। राजनीति शास्त्र में बी.ए.(आॅनर्स) करने के बाद आपकी साहित्य साधना और बढ़ गई। वर्तमान में आप एक साहित्यिक संस्था का दायित्व जपला, पलामू में ही निभा रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं संकलनों में आपकी रचनाएँ सतत प्रकाशित होती रहती हैं। गंगा (कविता-संग्रह), मुखौटा (कविता-संग्रह), त्रासदी (कविता-संग्रह), यादों में तुम (कविता-संग्रह) एवं निर्भया की माँ (कविता-संग्रह) आपके नाम प्रकाशित हैं। ‘मुखौटा’ का मराठी अनुवाद भी हुआ है। इधर,-तनहा सागर (ग़ज़ल-संग्रह), कुछ तुम कहो-कुछ मैं कहूँ (कविता-संग्रह), तथा मैं फिर आऊँगा (कविता-संग्रह) शीघ्र ही प्रकाशित होंगे। कुछ वार्षिक-अर्द्ध वार्षिक पत्रिकाओं का आपने सम्पादन भी किया है। २०१४ में दुष्यंत कुमार सम्मान, २०१५ में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ सम्मान, कविश्री सम्मान, संपादन श्री सम्मान एवं झारखंड गौरव सम्मान भी २०१७ में मिला है। आपको मातृभाषा हिन्दी सहित भोजपुरी एवं मगही भाषा भी आती है। कहानी, लघुकथा, उपन्यास, गीत, ग़ज़ल, छन्द, दोहा, मुक्तक, कविता, हाइकु, क्षणिका, व्यंग्य, समीक्षा,आलेख आपके लेखन का क्षेत्र है। निवास झारखंड के जपला, पलामू में है ।