आज देखा उसकी आंँखों में एक अलग-सी चमक थी,
यूं तो खामोश थी वह, पर सब कुछ कह रही थी।
उतरा-सा चेहरा, फिर भी चेहरे पर मुस्कान,
यही तो थी उसकी गरीबी की पहचान।
बोली वह मुझसे आकर, कुछ खाने को चाहिए,
सोच में पड़ गई आज मैं,
सुना था मैंने जीने के लिए तो बस प्यार चाहिए।
भूखी थी वह कब से, लेकिन आशा से भरी आँखों में,
बेसब्री का खुमार था छाया,
क्या हुआ क्यों किसी को, उस मासूम पर जरा-सा प्यार न आया??
उसकी गरीबी ही तो थी उसकी कमजोरी,
इसीलिए तो खाने को भी हाथ फैलाना उसकी थी मजबूरी।
मैंने पूछा-तुम पढ़ने क्यों नहीं जाती???
सहम-सी गई मैं सुनकर, जब वह बोली…
मन तो बहुत करता है जाने का, पर इन फटे कपड़ों में पढ़ने जाऊँ कि अपनी लाज बचाऊं!!!
रो पड़ा हो दिल जैसे, बात सुनकर उसकी,
देखा फिर खुद की तरफ मैंने हताश नजरों से,
इतने कपड़े हैं कि मैं तो याद भी नहीं रख पाती।
पास बिठाकर पूछा उससे मैंने-क्यों मांगने जाती है??
बोली वो-क्या करुं, मां हम 6 बहनों का पेट कहां भर पर पाती है।
सोचने लग गई उस की बात पर,क्यों किसी की बेटा पाने की चाहत नहीं जाती।
जाग उठी मानवता मेरी, जितनी हो सकी कर दी मदद उसकी।
कुछ आज खुद ने समझ लिया और कुछ उसको भी समझा दिया,
लगा जैसे मैंने अपना फर्ज निभाना शुरू कर दिया।
#प्रियंका जैन
परिचय : प्रियंका जैन का निवास मंदसौर जिला के शामगढ़ में है। २० साल की प्रियंका बीएससी की छात्रा है और कविताएँ रचती हैं। इसी लेखनी से ५ बार विद्यालय स्तर पर सम्मान पा चुकी है तो ३ बार जिला स्तर पर स्वरचित कविता में प्रथम विजेता रही है।
Bahut khoob