आरती जैन

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aarti jain

आज धन हो तो शिक्षा होती है,

बिना धन के तो प्रतिभा भी रोती है।

मुझे गर्व है मैं हिन्दुस्तान में रहती हूँ,
फिर क्यूं मेरे देश में केवल अंग्रेजी ही सम्मान से जीती है।

लाख योजना निकल के बन्द कागजों तक सीमित रह जाती है,
इसलिए तो लाखों कला घर की चार दीवारों में रहती है।

क्यूं मैकाले की नीति तक हमारी शिक्षा सीमित रह गई है,
क्यूं वेद-पुराण हो या बाइबल,कुरान की शिक्षा केवल ग्रंथों तक रह गई है।

क्यूं परिवार संस्कार की वो प्रथम पाठशाला केवल बातों तक रह गई है,
क्यूं परिवार की शिक्षा केवल दकियानूसी बातें बनकर रह गई है।

साधना है,पूजा है,शिक्षा क्यूं व्यापार और कारोबार तक सीमित होकर रह गई है,

नालंदा और तक्षशिला की शिक्षा केवल इतिहास बनकर रह गई है।

जवाब मिले तो बता देना-क्यूं मेरे देश की प्रतिभा रो रही है,

जवाब मिले तो बता देना-क्यूं मेरे देश की वास्तविक शिक्षा खो रही है।

                                                                  #आरती जैन
परिचय:  आरती जैन राजस्थान राज्य के डूंगरपुर में रहती है। आपने अंग्रेजी साहित्य में एमए और बीएड भी किया हुआ है। लेखन का उद्देश्य सामाजिक बुराई दूर करना है।

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।