क्या लाॅकडाउन में स्थानीय रोजगार खत्म होने के कगार पर खड़ा है?

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 स्थानीय रोजगार खत्म होने की कगार पर नहीं बल्कि खत्म हो गया है। दुकानदार सर्वोच्च आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। वह इस चिंता में हैं कि लाॅकडाउन के दिनों में दुकानों के किराए और बिजली के बिल कैसे चुकाएंगे? अपनी कमाई तो दूर की बात है।
 इसके अलावा व्यापारी वर्ग इसलिए परेशान है कि वह खुशहाली के स्वप्नपूर्ति हेतु बैंक से लिए ऋण का भुगतान कैसे करेंगे? बच्चों की फीस देंगे या बैंकों का ब्याज चुकाएंगे? किसान तो रक्तरंजित आंसु बहा रहा हैं।वह इस चिंता में हैं कि एक ओर लाॅकडाउन है और दूसरी और बेमौसमी बारिश ने फसलों को बर्बाद कर दिया है। छमाही फसलों को बेचने के उपरांत भी घाटा पड़ रहा है। जिससे किसान किसानी छोड़ने का मन बना रहे हैं। मजदूर वर्ग इसलिए परेशान है कि उद्योग बन्द होने पर रोजगार खत्म हो जाएंगे, तो वे पापी पेट की आग कैसे बुझाएंगे?
 सोशल मीडिया और दूरभाष पर चर्चा यह भी है कि लाॅकडाउन में विधायकों एवं सांसदों का राष्ट्र के प्रति क्या योगदान है? उनका न तो बैंकों का ब्याज बढ़ रहा है और ना ही फसलें खराब हो रही हैं। उन्होंने न तो कार्यालय का किराया देना है और ना ही उन पर कोई उत्तरदायित्व है। क्योंकि देश और देशवासियों के लिए मात्र और मात्र देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही उत्तरदाई हैं। माननीय मोदी जी यह कह रहे हैं और मोदी जी वो कर रहे हैं।बस यही कहने मात्र का भारतीय विधायक और सांसद लाखों रुपए डकार जाते हैं। जबकि इतना तो भारतीय बच्चा-बच्चा जानता है।
 उल्लेखनीय निम्न गंभीर प्रश्र भी स्वाभाविक है कि लाॅकडाउन में विधायकों और सांसदों का राष्ट्र और राष्ट्रवासियों हेतु आउटपुट अर्थात उत्पादन क्या है? सरकार जब अपने कर्मचारियों के लिए भविष्य निधि का प्रावधान करती है तो उसकी आपातकालिक प्राकृतिक आपदा, भुखमरी, महामारी इत्यादि की अपनी भविष्य निधि क्या है? वह 40 दिन के कालचक्र में ही कटोरा थामें भीख मांगती क्यों दिखाई दे रही है? क्यों बच्चों की गुल्लकों में जोड़ी धनराशि को स्वीकार कर रही है? जिससे ग़रीबों और मध्यम वर्ग की रातों की नींद उड़ हुई है कि जिस सरकार से हम आशा लगाए बैठे हैं, वह स्वयं नागरिकों से मांग रही है। जबकि एक-एक विधायक व सांसद परम धनवान है।
 अतः राष्ट्रहितों में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 के अंतर्गत अपनी अभिव्यक्ति की  स्वतंत्रता के मूल अधिकार का प्रयोग करते हुए उपरोक्त चर्चा के माध्यम से मेरा पत्रकारों, सम्पादकों, विद्वान लेखकों, साहित्यकारों, आलोचकों, बुद्धिजीवियों, शोधकों इत्यादि से विनम्र आग्रह है कि वे सरकार की भविष्य निधि और विधायकों व सांसदों के सकारात्मक उत्तरदायित्व निर्धारित करने की पुकार  को सुनिश्चित कर भारत के सामाजिक, आर्थिक, विधिक एवं स्वास्थिक विकास के उज्जवल भविष्य में योगदान करें।

इंदु भूषण बाली

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।